केस-1

मोहल्ला सुशील नगर निवासी सुनील कुमार ने बताया कि अबतक 25 हजार रुपये तक बाहर की दवाएं लिखी जा चुकी है। एक तरफ गरीबी परेशान कर रही है, वहीं दूसरी ओर बाहर की दवाएं खरीद-खरीद कर कर्ज के बोझ तले दबते ही जा रहे हैं।

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केस-2

ग्राम इटौरा निवासी वीरू यादव ने कहा कि एक तो इतनी दूर से जिला अस्पताल दिखाने के लिए आते हैं। जिससे सरकारी दवाओं का लाभ मिल सके। लेकिन आलम यह है कि अब तक 20 हजार रुपये की बाहर की दवाएं खरीद चुके हैं, और अभी समस्या का निराकरण नहीं हो सका है।

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जागरण संवाददाता, उरई : यह दो केस सिर्फ बानगी बस है। जिला अस्पताल में रोजाना 500 से अधिक मरीजों को बाहर की दवाएं डाक्टर द्वारा लिखी जा रही है। लाख प्रयास के बाद भी कमीशन के खेल पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। जबकि निश्शुल्क दवा दिए जाने की व्यवस्था है, लेकिन डाक्टर बाहर की कमीशन वाली दवा सरकारी पर्ची के साथ एक छोटी पर्ची पर लिख कर मालामाल हो रहे हैं। मरीजों की हालत देखकर बेरहमी का काम डाक्टर कर रहे हैं।

जिला अस्पताल में निश्शुल्क इलाज के साथ जांच व दवा उपलब्ध कराने का दावा तो किया जाता है, लेकिन इसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। कम दाम पर बेहतर दवा उपलब्ध कराने को जनऔषधि केंद्र स्थापित है। लेकिन कमीशन के आगे सब बेकार साबित हो रहा है। एक रुपये की पर्ची पर चिकित्सक हजारों रुपये की जांच व दवाएं बाहर की लिख देते हैं। बाहर मेडिकल स्टोरों पर मिलने वाली कमीशन की दवाओं के लिए एक छोटी पर्ची जरूर लिखते हैं। जिला अस्पताल के अलावा महिला अस्पताल व सीएचसी-पीएचसी में भी यही स्थिति है। बीते कुछ माह पहले मरीजों ने डीएम तक से शिकायत की। लेकिन कुछ सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। स्वास्थ्य महकमा कार्रवाई व सख्त कदम उठाने का आश्वासन लोगों को देकर पल्ला झाड़ लेता हैं।

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व्यवस्थाओं को दुरुस्त कराने के लिए ठोस कदम उठाएं जाएंगे। जिससे जिला अस्पताल से मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सके।

डा. अवनीश बनौधा, सीएमएस जिला अस्पताल

Edited By: Jagran