सीप-उड़द की दाल और शंख-कौड़ियों से बनी 210 फीट ऊंची लंका मीनार, 169 साल पहले 1.75 लाख से हुआ था निर्माण
जालौन के कालपी में 1857 में निर्मित 210 फीट ऊंची लंका मीनार, जो सीप, उड़द दाल और शंख-कौड़ियों से बनी है, आज अनदेखी का शिकार है।

सीप-उड़द की दाल और शंख-कौड़ियों से बनी 210 फीट ऊंची लंका मीनार।
HighLights
1857 में सीप, उड़द दाल से बनी 210 फीट ऊंची लंका मीनार।
बाबू मथुरा प्रसाद निगम ने रावण की स्मृति में कराया था निर्माण।
रखरखाव की कमी से जर्जर, स्थानीय लोग संरक्षण की मांग करते।
जागरण संवाददाता, जालौन। सीप-उड़द की दाल और शंख-कौड़ियों से निर्मित 210 फीट ऊंची लंका मीनार आज अनदेखी का शिकार है। यही कारण है कि दस साल पहले तक इस मीनार को बाहर से देखने आने वाले पर्यटकों की संख्या भी कम होती जा रही है।
युवाओं का कहना है कि मीनार हमारे जिले की शान है, इसकी देखरेख होनी चाहिए। कालपी स्थित लंका मीनार रावगंज मोहल्ले में स्थित है। कुतुबमीनार की तरह दिखने वाली इस मीनार का निर्माण सन् 1857 में कालपी निवासी वकील बाबू मथुरा प्रसाद निगम ने कराया था।
वह अपने समय में रामायण प्रसंगों पर आधारित रामलीला में रावण के किरदार का पूरी जीवंतता के साथ निर्वहन करते थे। उनकी तन्मयता को देख कर ही उनको लोग लंकेश कह कर पुकारते। रावण की स्मृति को संरक्षित करने के लिए ही उन्होंने 210 फीट ऊंची लंका मीनार का निर्माण करवाया।
सीप और उड़द की दाल से हुआ निर्माण
इसके लिए उन्होंने अपनी जायदाद भी बेच डाली थी। इसको सीप, उड़द की दाल, शंख, कौड़ियों से बनाने में बीस वर्ष का समय लगा था। लगभग 1.75 लाख का खर्च आया था। इसमें सात चक्कर में 173 घुमावदार सीढ़ियां अंदर बनी हुई हैं। ये सात मोड़ रामचरित मानस के सात सोपानों के परिचायक हैं।
कानपुर-झांसी हाईवे पर स्थित कालपी कस्बे में यमुना पुल पार कर दुर्गा मंदिर चौराहे से बाएं रेलवे स्टेशन रोड पर आगे 500 मीटर की दूरी पर स्थित मोहल्ला रावगंज में दूर से ही मीनार के दर्शन हो जाते हैं। मीनार के चारों ओर लंका कांड की चित्रमय प्रस्तुति उकेरी गई है।

सबसे ऊपर 15 फीट ऊंची छत्रसहित ब्रह्मा जी की मूर्ति स्थापित थी, जो सन् 1934 में आए भूकंप में क्षतिग्रस्त हो गई थी। मथुरा प्रसाद के भतीजे श्रवण कुमार निगम कहते हैं कि इस मीनार की विशेषता इसका निर्माण और इसकी स्थापत्य-कला है। सात मोड़ों अर्थात सात चक्कर के रूप में बनी घुमावदार सीढ़ियां इस मीनार में अंदर हैं। ये सात मोड़ रामचरित मानस के सात सोपानों (कांडों) के परिचायक हैं।
लंका मीनार परिसर में इस मीनार के अतिरिक्त बाबू मथुरा प्रसाद निगम ने भगवान शंकर का मंदिर भी बनवाया था। इसे बनवाने के पीछे उनका उद्देश्य था कि शिवभक्त रावण अपने महल से भगवान शिव के दर्शन कर सके।
मीनार परिसर में भगवान की मूर्तियां स्थापित
मीनार परिसर में रावण दरबार, अयोध्यापुरी, जनक द्वारिका, शनिदेव मंदिर, मथुरापुरी की छवियां निर्मित हैं। बारह विष्णु अवतार, 27 नक्षत्र तथा चारों युगों से संदर्भित प्रतिमाएं स्थापित हैं। स्व. मथुरा प्रसाद निगम का रावण भक्त परिवार भगवान राम के प्रति आस्थावान और पूर्वजों की परंपरा को कायम रखते हुए आज भी रामलीला का आयोजन करवाता है।
क्षेत्र की भव्यता को समाहित किए लंका मीनार आज रखरखाव के अभाव में जर्जर होती जा रही है। मथुरा प्रसाद के भतीजे श्रवण कुमार निगम इसके रखरखाव को लेकर कई बार प्रशासन से अपील कर चुके हैं।
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लंका मीनार पूरे जिले के लिए एक विरासत के रूप में नजर आती है। इसका पुरातत्व विभाग को पूरी प्राचीन इमारतों की तरह ही संरक्षित कर मरम्मत करानी चाहिए।
अंशुल गुप्ता
लंका मीनार के ऊपर जाते ही पूरे कस्बे के भवन दिख जाते हैं। अगर इसकी रंगाई पुताई करा दी जाए तो इसका स्वरूप और भव्य हो सकता है।
शेखर कुमार
