उरई, निज प्रतिनिधि: आल्हा ऊदल मिथकीय चरित्र नहीं, सजीव ऐतिहासिक पात्र है। अंग्रेज अधिकारियों ने भी अपनी खोज के बाद इसकी पुष्टि की थी। बुंदेलखंड भर में कई ऐसी इमारत और स्थल संरक्षित किये गये है जो किसी न किसी रूप में आल्हा से संबंधित है। यह कहना है लोक संस्कृति विशेषज्ञ अयोध्या प्रसाद कुमुद का। उनकी एक पुस्तक भी इस विषय में प्रकाशनाधीन है।

कुमुद ने बताया कि महोबा राज्य से निर्वासन के समय आल्हा ऊदल कन्नौज के राजा के आश्रय में रहे थे। इस कारण कन्नौज राज्य में जिसमें फतेहगढ़ भी आता था आल्हा की शौर्य गाथा के कवित्त गाये जाते है। ब्रिटिश शासन में फतेहगढ़ के कलेक्टर चा‌र्ल्स इलियट ने कन्नौज के आल्हा गायकों को बुलवाकर उनसे सारे कवित्त संग्रहीत किये। मुंशी रामस्वरूप से संपादित कराकर उन्होंने दिलकुशा प्रकाशन से पुस्तक प्रकाशित करायी। बाद में यह 'ले आफ आल्हा' के नाम से अंग्रेजी में लंदन की आक्सफोर्ड प्रेस ने छापा। उधर साहित्यकार विंसेट स्मिथ व जार्ज अब्राहीम रियर्सन ने बिहार व उत्तर प्रदेश के विभिन्न अंचलों में प्रचलित पुरातत्व विषय की पत्रिकाओं से आल्हा की काव्य गाथायें एकत्रित करायीं और विश्व प्रसिद्ध पत्रिका इंडियन एंटीक्वेयरी में एक लेख प्रकाशित कराया।

जगनिक को लेकर भ्रम

बुंदेलखंड में बारिश के मौसम में जगनिक रचित वीरोत्तेजक खण्ड काव्य आल्हखंड का गायन गांव-गांव में चौपालों पर होता है। हालांकि जगनिक को लेकर भ्रम है क्योंकि जगनिक उर्फ जगनायक के नाम के समकालीन दो व्यक्ति थे। इनमें एक जगनिक महोबा के महाराजा परमाल का भांजा था। काव्य के सबसे प्रमाणित पाठ में दोनों जगनिक का संवाद मिलता है। कुमुद के अनुसार जगनिक ने यह काव्य युद्ध की समाप्ति के बाद लिखा था जबकि परमाल का भांजा जगनिक युद्ध में मारा गया था।

स्थलीय साक्ष्य

कुमुद के अनुसार आल्हा की मौजूदगी के कई स्थलीय साक्ष्य भी उपलब्ध हैं। ललितपुर के पास मदनपुर में 2 शिलालेख मिले है जिनमें एक पर 1182 ईसवी लिखा है। इस पर जैजागभुक्ति यानी बुंदेलखंड पर पृथ्वीराज की विजय का उल्लेख है। दूसरा शिलालेख 1178 ईसवी का है जिसमें बिदौसा प्रमुख आल्हनदेव का उल्लेख है। यह शिलालेख पढ़ने से स्पष्ट होता है कि मदनपुर के निकट बिदौसा गांव है जो उस समय महोबा राज्य का मंडल स्तर का प्रशासनिक केंद्र था, आल्हा राज्य के प्रतिनिधि थे। आल्हखंड में कई जगह आल्हा को आल्हन कहा गया है। सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य मदनपुर की बड़ी झील है जहां लगभग 50-60 एकड़ में बारादरी बनी है। आल्हा ऊदल इसी स्थान पर अपनी कचहरी लगाते थे। पन्ना राज्य संग्रहालय में महाराजा छत्रसाल का एक पत्र रखा है जो उन्होंने अपने पुत्र जगतराज को लिखा था जिसमें पन्ना राज्य के एक स्थान पर आल्हा का खजाना मिलने का जिक्र था। इलाहाबाद जिले में चिल्ला के पास आल्हा का महल था। इसे भी भारतीय पुरातत्व विभाग ने संरक्षित किया है। महोबा में आल्हा की लाट यानी विजय स्तंभ संरक्षित है। यह सारे साक्ष्य आल्हा के इतिहास पुरुष होने की गवाही देते है।

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