जासं, हाथरस : जनपद में कोरोना संक्रमण की रफ्तार बढ़ रही है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर नहीं हो पा रही हैं। इसके कारण मरीजों को भटकना पड़ रहा है। पिछले साल आए 20 वेंटीलेटरों में से आधे बंद पड़े हैं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का दावा है कि कोविड में एमडीटीबी हॉस्पिटल में 10 वेंटीलेटर को तकनीशियनों के सहारे चलवाया जा रहा है। उन्हें चलाने के लिए विशेषज्ञ नहीं मिल रहे हैं। जिला अस्पताल में इलाज नहीं मिलने पर मरीजों को रेफर भी किया जा रहा है। वहीं रैपिड ट्रीटमेंट न मिलने से मरीजों की मौत भी हो रही है। दैनिक जागरण ने बुधवार को जिला अस्पताल में हकीकत जानने की कोशिश की तो हालात अच्छे नजर नहीं आए। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का तो और बुरा हाल है, वहां पर ऑक्सीजन तो दूर की बात है, समय पर एंबुलेंस भी नहीं मिल रही है।

केस-एक : हाथरस जंक्शन के लच्छीपुर निवासी रामखिलाड़ी को सांस लेने में दिक्कत आ रही थी। उनके स्वजन उन्हें जिला अस्पताल लाए। बमुश्किल ऑक्सीजन तो मिल गई, लेकिन यहां और रैपिड ट्रीटमेंट नहीं मिला। आखिर में कह दिया कि हमारे बस का नहीं है, कहीं ओर ले जाओ।

केस-दो : सासनी के खोरना गांव निवासी 60 वर्षीय मिथलेश रावत को सांस लेने में दिक्कत थी। कोरोना जांच में पाजिटिव आई थीं। होम क्वारंटाइन की कहने पर घर पर महिला की तबीयत बिगड़ गई। उन्हें सीएचसी ले गए। वहां से जिला अस्पताल के एल-टू हॉस्पिटल रेफर कर दिया। समय पर ऑक्सीजन व एंबुलेंस नहीं मिली। मौत हो गई। नहीं मिल पाए विशेषज्ञ

जिला अस्पताल में पिछले साल 20 वेंटीलेटर आए थे। स्वास्थ्य विभाग के अफसरों का दावा है कि 10 वेंटीलेटर तकनीशियनों के मदद से चलाए जा रहे हैं। अभी तक विशेषज्ञों की व्यवस्था नहीं हो पाई है। ऑक्सीजन लेवल की मॉनीटरिग करने और सिसकते मरीजों को रैपिड ट्रीटमेंट देने के लिए कोई विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है। स्वास्थ्य विभाग भी कई बार शासन को रिपोर्ट भेज चुका है। भाजपा के स्थानीय पदाधिकारी हाईकमान को भी इन हालातों के बारे में बता चुके हैं। एक साल बाद जनप्रतिनिधि जागे

कोरोना संक्रमण की पहली लहर पिछले साल भी आई थी। उस दौरान भी कई लोग शिकार हुए थे। उस समय भी जिला अस्पताल में वेंटीलेटर चलाने के लिए विशेषज्ञ नहीं थे और जीवन रक्षक इंजेक्शन और दवाओं की कमी महसूस की गई। इस बार ऑक्सीजन की कमी अधिक महसूस की जा रही है। उसके बाद दूसरी लहर में और गंभीर हालात पैदा हो गए हैं। अब जनप्रतिनिधि सीएम से भी बात कर रहे हैं और अपनी विधायक निधि भी कोविड मरीजों की मदद के लिए दे रहे हैं। ऑक्सीजन प्लांट की पिछले साल से मांग होती तो शायद बेहतर होता। पिछले साल ही इंतजाम शुरू हो जाते तो कुछ और जिदगी बचाई जा सकती थी। फिर कहां जा रही है ऑक्सीजन

प्रशासन की ओर से लगातार दूसरे जनपदों से ऑक्सीजन मांगी जा रही है। रोजाना लगभग 200 सिलिडर की मांग की जा रही है। गुरुवार के लिए भी इतने ही सिलिडर की मांग की गई। सवाल इस बात का है कि यदि ऑक्सीजन आ रही है तो फिर कहां जा रही है। जनपद में ऑक्सीजन की एजेंसियों पर ताला लटका हुआ है। निजी एंबुलेंस वाले भी ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। मरीजों के तीमारदार अपने मरीजों की जिदगी बचाने के लिए मुंहमांगे दाम देने को मजबूर हैं, फिर भी गैस नहीं मिल रही है। ये हैं इंतजाम

दावा किया जा रहा है कि जनपद में दो एल-वन और चार एल-टू श्रेणी के हॉस्पिटल हैं। एल वन हॉस्पिटल सीएचसी मुरसान में 30 बेड का है। इसमें ऑक्सीजन बेड 24 हैं। आइसीयू बेड एक भी नहीं है। वहीं सिकंदराराऊ के जेपी हॉस्पिटल में 100 बेड हैं और उसमें ऑक्सीजन बेड की संख्या 15 है जबकि आइसीयू का एक भी बेड नहीं है। एल टू हॉस्पिटल एमडीटीबी में 40 बेड है। इसमें ऑक्सीजन बेड 30 हैं और आइसीयू बेड 10 हैं। एल टू हॉस्पिटल एबीजी हॉस्पिटल में 50 बेड में से ऑक्सीजन बेड 20 और आइसीयू बेड एक है। एल टू हॉस्पिटल प्रेम रघु हॉस्पिटल में 50 बेड में 40 ऑक्सीजन बेड हैं और 10 आइसीयू बेड हैं। एल टू हॉस्पिटल श्रीराम हॉस्पिटल में 50 बेड में 40 ऑक्सीजन बेड और आइसीयू के 10 बेड हैं। वर्जन

अस्पताल में जितने भी वेंटीलेटर हैं, सभी को चलवाया जा रहा है। उन्हें अस्पताल में मौजूद स्टाफ ही चला रहा है। शासन को स्थिति के बारे में बता चुके हैं।

डॉ. ब्रजेश राठौर, सीएमओ