जागरण संवाददाता, हाथरस : नोटबंदी, जीएसटी और अब लडखड़ाती वैश्विक अर्थव्यवस्था ने शहर के रेडीमेड गार्मेंट कारोबार की भी कमर तोड़ दी है। डिमांड घटने से प्रोडक्शन पर असर पड़ा है। तीन महीने में 50 फीसद काम कम हुआ है। लेबर को छुट्टी पर भेजना पड़ रहा है। यह पहली बार है, जब मंदी का सीधा असर शहर के लघु व कुटीर उद्योगों पर पड़ रहा है। व्यापारी सीधे तौर पर केंद्र सरकार की नीतियों को इसका कारण मान रहे हैं।

रेडीमेड कारोबार :

हींग व रंग की तरह रेडीमेड गार्मेंट कारोबार भी हाथरस शहर की पहचान है। चक्की बाजार व उसके आसपास का एरिया कारोबार का हब है। यहां सर्वाधिक फैक्ट्रियां हैं। शहर में लगभग 80 पंजीकृत इकाई हैं, जो हर साल लगभग 50 से 60 करोड़ रुपये का टर्नओवर देती हैं। लगभग इतनी ही इकाइयां अपंजीकृत हैं। पिछले चार दशक में यह कारोबार घर-घर पहुंच चुका है। रेडीमेड कारोबार में सबसे अधिक बाबा सूट्स (बच्चों के परिधान) का निर्माण होता है। आगरा, सूरत, दिल्ली व मुंबई से कपड़ा आता है। इसके बाद तैयार माल उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य प्रांतों में भेजा जाता है।

कारोबार पर असर :

कपड़े पर पहले टैक्स नहीं लगता था, लेकिन जीएसटी लागू होने के बाद कपड़े को पांच फीसद के स्लैब में रखा गया। कारोबार पर प्रभाव पड़ने के कारण उस दौरान कारोबारियों ने प्रदर्शन भी किए थे, लेकिन लाभ कुछ नहीं हुआ। नोटबंदी के बाद जैसे-तैसे जीएसटी से उबरने का प्रयास कर रहे कपड़ा कारोबारियों को अब वैश्विक मंदी का सामना करना पड़ रहा है। गार्मेंट कारोबारी व एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रहे सत्यनारायण गर्ग ने बताया कि मंदी पहले भी आती रही है, लेकिन कभी इस तरह लघु उद्योगों पर असर नहीं पड़ा। दरअसल नोटबंदी से पहले मार्केट में कैश फ्लो की कमी नहीं थी। लोगों के हाथ में जमा-पूंजी रहती थी, जिससे व्यापार प्रभावित नहीं होता था। अब जरा सा मार्केट प्रभावित होते ही कारोबार बैठ जाता है।

मार्केट में फंसा रुपया :

करोड़ों रुपये के लेनदेन करने वाले रेडीमेड कपड़े के कारोबारी इस समय संकट से जूझ रहे हैं। बाहर के व्यापारियों ने नकदीकरण व मंदी की समस्या बताकर भुगतान रोक लिया है। भुगतान न होने से नया प्रोडक्शन भी बंद है। रक्षाबंधन व उससे पहले भेजे गए माल का भुगतान अब दीपावली बाद करने को कह रहे हैं। कारोबारी अब दीपावली पर मार्केट सुधरने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

कामगारों को छुट्टी पर भेजा :

डिमांड न होने के कारण पिछले तीन महीने में प्रोडक्शन 50 फीसद से अधिक गिरा है। इसके कारण कारीगर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। इसलिए कारोबारी दैनिक वेतन पर काम करने वाले कारीगरों को छुट्टी पर भेजने को मजबूर हैं। फैक्ट्री से 40 फीसद लेबर कई-कई दिन की छुट्टी पर भेजे जे रहे हैं। इससे कारीगरों के सामने भी रोजी-रोटी का संकट है। वर्जन-

रेडीमेड कारोबार ने कभी इस तरह की मंदी का सामना नहीं किया। हाथ में कैश न होने से मार्केट पूरी तरह ठप है। प्रोडक्शन तो पहले ही कम हो चुका है। अब बंदी की कगार पर है। सितंबर तक भी मंदी का सामना करना पड़ सकता है। अक्टूबर से उम्मीदें हैं।

-विकास गर्ग, रेडीमेड गार्मेंट्स कारोबारी

केंद्र सरकार को अपनी नीतियों में सुधार करना चाहिए। व्यापारियों के प्रति सख्त रुख के कारण ही डाउन फॉल है। व्यापारी भयभीत हैं। इसलिए रिस्क लेने की स्थिति में नहीं हैं। डिजिटल भारत की आड़ में मार्केट से कैश खींच लिया गया है। हर उद्योग के लिए हालात विपरीत हैं।

-सुरेंद्र वाष्र्णेय, पूर्व अध्यक्ष, हाथरस रेडीमेड गार्मेंट एसोसिएशन

Posted By: Jagran

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