संवाद सहयोगी, हाथरस : किसानों ने खेतों में फसलों के अवशेष जलाने की बजाय उससे पशुओं का चारा बनाना शुरू कर दिया है। इससे जलने से होने वाले प्रदूषण में भी कमी की संभावना है।

खरीफ की फसलों में धान, मक्का, बाजरा, तिल, कपास आदि शामिल हैं। इन फसलों में सबसे अधिक अवशेष धान के अलावा मक्का, बाजरा आदि के होते हैं। एनजीटी के निर्देश पर पिछले दिनों जिलाधिकारी ने सख्त कार्रवाई करने के निर्देश अधीनस्थ अधिकारियों को दे रखें हैं। इसके लिए बाकायदा टीमों का भी गठन कर दिया गया। इसका असर भी दिखना शुरू हो गया है।

अवशेष जलाने के दुष्प्रभाव : फसलों के अवशेष जलाने से वायु प्रदूषण के अलावा मिट्टंी के पोषक तत्वों में कमी आती है। मिट्टंी में मित्र कीट भी खत्म हो जाते हैं। इससे जमीन की उर्वरा क्षमता कम होती है।

फसल अवशेष की उपयोगिता :

इसका उपयोग पशुओं के चारे के लिए किया जा सकता है। इससे चारे की कमी पूरी हो जाती है। इन अवशेषों को मिट्टी में मिलाने से भी खेत की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि होती है। किसान बोले

- पहले किसान धान आदि के फसलों के अवशेष खेतों में ही जला देते थे। अब उन्हें जलाने की बजाय पशुओं को चारे में मिलाकर खिलाया जा रहा है।

राजीव कुमार, किसान जानकारी के अभाव में ही फसलों के अवशेष खेत में जलाते जाते थे। अब उनके नुकसान की जानकारी होने से इसे जलाना बंद कर दिया है।

सत्यप्रकाश गौतम, किसान इनकी सुनो

फसलों के अवशेष जलाने से सभी जीवधारियों को नुकसान है। जलने से उठने वाले धुएं से सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। मिट्टी व जलवायु भी प्रभावित होते हैं।

- डॉ. एसके रावत, कृषि वैज्ञानिक

Posted By: Jagran

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