संसू, हाथरस : सिकंदराराऊ में कोरोना की दूसरी लहर का हमला गांवों में सर्वाधिक हुआ मगर ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। सफाई कर्मचारियों से लेकर धरती के भगवान डॉक्टरों तक की भारी कमी चल रही है। कई साल से ऐसे ही हालात होने के कारण ग्रामीण मरीजों ने सीएचसी से मुंह मोड़ लिया है। आजकल ओपीडी बंद होने से गरीब तबके के ग्रामीण झोलाछापों के यहां शरण ले रहे रहे हैं। ट्रॉमा सेंटर के भी चालू न होने से सड़क हादसे के शिकार कई लोग तात्कालिक सुविधाएं न मिलने से जान गंवा चुके हैं। विशेषज्ञ चिकित्सक न होने के कारण मरीजों को यहां से अलीगढ़ व हाथरस के लिए रेफर कर दिया जाता है। दैनिक जागरण की टीम ने सोमवार को सिकंदराराऊ के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की हकीकत जानने की कोशिश की तो तमाम खामियां सामने आईं।

ये हैं हालात : सिकंदराराऊ सीएचसी से नगर तथा ग्रामीण क्षेत्र की लगभग दो लाख 75,000 की आबादी जुड़ी हुई है। मुख्यालय पर स्थित यह 30 बेड वाला एकमात्र अस्पताल है, जहां सामान्य दिनों में औसतन 300 मरीजों की ओपीडी प्रतिदिन होती है। चिकित्सा प्रभारी डॉ. रजनेश यादव सहित यहां पर तीन एमबीबीएस डॉक्टर हैं। हालत इतनी खराब है कि अस्पताल में एक भी वार्ड ब्वॉय नहीं है। मात्र दो सफाई कर्मचारी हैं। तीन फार्मासिस्ट हैं, जिनमें से दो कोरोना ड्यूटी पर चल रहे हैं। पांच स्टाफ नर्स हैं। सीएचसी पर अल्ट्रासाउंड की कोई व्यवस्था नहीं है। गर्भवती महिलाओं को अल्ट्रासाउंड कराने के लिए हाथरस रेफर करना पड़ता है। एंबुलेंस झाड़ियों में खड़ी रहती हैं और हैंडपंप भी खराब है।

चुनौतियां और जरूरतें : सुविधाएं न होने के कारण यहां पर 30 बेड खाली पड़े रहते हैं। इमरजेंसी में सिर्फ प्राथमिक उपचार देकर रेफर स्लिप थमा दी जाती है। सीएचसी में डॉक्टर के आठ पद स्वीकृत हैं। यहां कोई विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात नहीं है। एनिस्थीसिया के अलावा बाल रोग, महिला रोग, सर्जन, हड्डी रोग, नेत्र सर्जन आदि विशेषज्ञों के पद खाली पड़े हैं, जिन पर नियुक्ति नहीं की गई हैं। इनके अलावा रेडियोलॉजिस्ट की भी दरकार है। जांच के नाम पर सिर्फ मलेरिया, बुखार व शुगर की जांच हो पाती है। अन्य सभी जांच के लिए जिला अस्पताल की ओर देखना पड़ता है। इतने बड़े अस्पताल के लिए छह सफाई कर्मियों की जरूरत है। कोविड काल में दो सफाई कर्मचारियों से सफाई कैसी होगी। ट्रॉमा सेंटर को नहीं मिला स्टाफ

जीटी रोड और मथुरा-बरेली रोड के सहारे होने के कारण सड़क दुर्घटनाओं को ध्यान में रखकर शासन ने ट्रामा सेंटर की स्वीकृति दी थी, लेकिन चार साल से बनकर तैयार खड़ा ट्रॉमा सेंटर अब तक संसाधनों के अभाव में शुरू नहीं हो सका है। आवश्यक उपकरण एवं डॉक्टर तथा स्टाफ उपलब्ध नहीं कराया गया है, जिसके परिणाम स्वरूप छह बेड वाला वार्ड, सर्जिकल आइसीयू, ऑपरेशन थिएटर, एक्स-रे रूम, लैब, माइनर ओटी, प्री व पोस्ट ऑपरेटिव रूम अनुपयोगी पड़े हैं। हालांकि पिछले कुछ समय से इस ट्रामा सेंटर के भवन का प्रयोग सीएचसी की इमरजेंसी के रूप में किया जाने लगा है। ट्रॉमा सेंटर के लिए दस बेड व एबीजी मशीन आ चुकी है।

कोविड काल में स्थिति : कोरोना काल में ओपीडी बंद कर दी गई है। डॉक्टर से लेकर नर्स एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की ड्यूटी कोरोना संबंधी कार्यों में लगा दी गई है, जिससे स्टाफ की भारी कमी है। मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ट्रामा सेंटर में मरीजों की सुविधा के लिए फीवर डेस्क स्थापित की गई है। जहां पर आने वाले बुखार के मरीजों को मेडिसिन किट प्रदान की जाती है।

कोविड काल में प्रयास : अब तक 12,675 लोगों को कोरोना के टीके लगाए जा चुके हैं। 75 निगरानी समितियां नगर तथा ग्रामीण क्षेत्र में लगी हुई हैं, जिनमें एक-एक आशा व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता शामिल हैं। कोरोना की एंटीजन जांच रिपोर्ट उसी दिन मिल जाती है, जबकि आरटी पीसीआर 72 घंटे में आती है। कोविड मरीजों की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए विधायक वीरेंद्र सिंह राणा की ओर से विधायक निधि से 35 लाख रुपये दिए गए हैं। बोले लोग

नगर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर किसी प्रकार की कोई स्वास्थ्य सुविधा नहीं है। नाम मात्र का अस्पताल है। जहां से मरीजों को सिर्फ रेफर किया जाता है।

इकराम कुरैशी सीएचसी पर सुविधाएं न होने से गांव के लोग झोलाछाप चिकित्सक से इलाज कराते हैं। या फिर पड़ोसी शहरों में जाकर प्राइवेट डॉक्टरों को दिखाते हैं। ट्रामा सेंटर भी चालू नहीं हुआ है।

विशाल वाष्र्णेय चिकित्सा अधिकारी का वर्जन

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर विशेषज्ञ चिकित्सक तैनात नहीं हैं। आवश्यक मशीनें जिला स्तर पर होने के कारण जांच जिला अस्पताल में कराई जाती हैं। ओपीडी बंद होने की वजह से इमरजेंसी पर फीवर डेस्क स्थापित करके मरीजों को बुखार की दवाई दी जा रही है।

डॉ. रजनीश यादव, चिकित्सा अधीक्षक, सीएचसी सिकंदराराऊ।

Edited By: Jagran