जासं, हाथरस : पांच अगस्त को राम मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास होने जा रहा है। कई दशक पहले मंदिर निर्माण आंदोलन में संघर्ष करने वाले उन दिनों को रह-रहकर याद करते हैं। इस दिन को लेकर गर्व भी महसूस कर रहे हैं। उन्हीं लोगों में शामिल हैं सासनी के प्रकाशचंद्र शर्मा। छह दिसंबर 1992 की घटना को जीवन की प्रमुख अविस्मरणीय घटना मानकर आज भी हृदय रोमांचित हो जाता है। शारीरिक रूप से अस्वस्थ होने के कारण शिलान्यास कार्यक्रम में जाने में असमर्थ हैं, लेकिन मन में वही उत्साह और उमंग आज भी है। पांच अगस्त के दिन को दीपावली के पर्व से कम नहीं मानते हैं और उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

संघ की पृष्ठभूमि से जुड़े होने के कारण प्रकाशचंद्र शर्मा राम मंदिर आंदोलन से शुरू से ही प्रमुखता से जुड़े रहे। 1984 में संघ के आनुसांगिक संगठन विश्व हिदू परिषद के नेतृत्व में रामजन्मभूमि आंदोलन में बढ़चढ़कर भाग लिया। गांव-गांव जाकर श्री राम शिला पूजन कराया। आंदोलन को गति देने के लिए शहर से लेकर गांवों तक में नुक्कड़ सभाएं कर लोगों में जोश भरा। उस समय 'बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का' नारा गांव-गांव में लोकप्रिय हुआ। 1990 में कारसेवकों पर कार्रवाई को लेकर मुलायम सिंह यादव की सरकार के विरुद्ध रामभक्तों को एकजुट कर 30 अक्टूबर 1990 को जेलभरो आंदोलन को गति प्रदान की। इस अवधि में विभिन्न यात्राओं को लेकर कार्यक्रम कराए। 30 नवंबर 1992 को स्थानीय पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी अयोध्या के लिए कूच किया था। विवादित ढांचा के ध्वस्तीकरण के गवाह भी बने। अयोध्या में कार सेवकपुरम में रहकर आठ दिसंबर को अपने जत्थे के साथ हाथरस सिटी स्टेशन पर उतरे। जहां सभी रामभक्तों की ओर से अभूतपूर्व स्वागत किया गया।

फालिस होने के कारण प्रकाशचंद्र शर्मा खुद को अशक्त महसूस करते हैं लेकिन पांच अगस्त को श्री राममंदिर के शिलान्यास को ऐतिहासिक दिन तथा इस आंदोलन को श्री रामभक्तों के त्याग व तपस्या का फल मानते हैं। साथ ही 500 साल से अधिक निरंतर संचालित इस आंदोलन के पटाक्षेप और अपनी आंखों के सामने निर्माण होने जा रहे भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर को अपने कई जन्मों के पुण्य का फल मानते हैं।

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