असली तलवार और भालों से युद्ध, हाथी-घोड़ों से सजता था मंच; 180 साल पुरानी रामलीला की दिलचस्प कहानी
हरदोई के पाली कस्बे की 180 वर्ष पुरानी रामलीला अपने गौरवशाली इतिहास के लिए जानी जाती है, जहां कभी असली तलवारों और भालों से युद्ध का मंचन होता था।

HighLights
पाली की रामलीला 180 वर्ष पुरानी, गौरवशाली इतिहास।
पहले असली तलवार, भाले, हाथी-घोड़ों का प्रयोग।
आस्था और परंपरा आज भी जीवंत, भव्य रामबारात की तैयारी।
दुर्गेश दीक्षित, हरदोई। हाथी-घोड़ों की दौड़। असली तलवारों और भालों से युद्ध का मंचन। धनुष-बाण लेकर मैदान में उतरते कलाकार। किले की छत से रामलीला देखती रानी और मैदान में उमड़ती ग्रामीणों की भीड़।
यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, बल्कि वरुण गंगा के तट पर बसे ऐतिहासिक पाली कस्बे की करीब 180 वर्ष पुरानी रामलीला के गौरवशाली अतीत का है।
अंग्रेजी हुकूमत में शुरू हुई रामलीला ने जमींदारी प्रथा से आधुनिक दौर तक कई बदलाव देखे। समय के साथ मंचन का स्वरूप बदला। हाथी-घोड़ों की दौड़ और असली अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग इतिहास बन गया, लेकिन आस्था और परंपरा आज भी जीवंत है। इस बार 18 अक्टूबर को निकलने वाली भव्य रामबारात की तैयारियां चल रही हैं।
असली तलवार और भाले का होता था इस्तेमाल
मेला कमेटी से जुड़े और रामलीला में हनुमान की भूमिका निभा चुके वेद नारायण अवस्थी कक्का बताते हैं कि बुजुर्गों के अनुसार जमींदारी काल में भारत सिंह और चौधरी फतेह सिंह आयोजन कराते थे। स्थानीय कलाकार असली तलवार, भाले और धनुष-बाण लेकर मंचन करते थे।
दूरदराज से ग्रामीण आते थे रामलीला देखने
हाथियों और घोड़ों की दौड़ विशेष आकर्षण होती थी। मोहल्ला बेनीगंज स्थित चौधरी फतेह सिंह के किले की छत से उनकी रानी रामलीला देखती थीं। दूरदराज से ग्रामीण मेला देखने आते थे।

1964 में पहली बार मेला कमेटी बनी
वर्ष 1964 में पहली अधिकृत मेला कमेटी बनी। इसमें 23 सदस्य थे। करन सिंह अध्यक्ष और गंगादयाल मिश्रा उपाध्यक्ष बने। वर्ष 1966 में रामलीला मैदान की भूमि संबंधी आदेश हुआ। वर्तमान में कमेटी के 150 सदस्य हैं। अध्यक्ष गंगा विष्णु मिश्रा और मंत्री पूर्व चेयरमैन कमलाकांत बाजपेई हैं।
पाली की रामलीला की ऐतिहासिक कहानी
कोषाध्यक्ष रामू अग्निहोत्री बताते हैं कि पहले रामबारात सीमित क्षेत्र में निकलती थी। अब चौधरी फतेह सिंह स्मारक से निकलकर नगर भ्रमण करती है। रामलीला मैदान में स्वागत होता है। बदलते दौर में आयोजन की भव्यता बढ़ी है। करीब पौने दो शताब्दी पुरानी यह रामलीला आज भी पाली की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बनी हुई है।
