हरदोई की विजया अवस्थी: संघर्ष से संवारा स्कूल, बेटियों को दी शिक्षा, मिला राज्य अध्यापक पुरस्कार
शिक्षिका विजया अवस्थी ने हरदोई के मंसूरनगर विद्यालय को अतिक्रमण से मुक्त कराकर संवारा और विद्यार्थियों की संख्या 136 से 360 तक बढ़ाई।

पिहानी में छात्राओं के साथ में मौजूद शिक्षिका विजया अवस्थी। सौ.से स्वयं
HighLights
अतिक्रमण से घिरे मंसूरनगर विद्यालय को संवारा।
विद्यार्थियों की संख्या 136 से बढ़कर 360 हुई।
छह बेटियों की पढ़ाई का खर्च खुद उठाया।
पंकज मिश्र, हरदोई। कठिन हालात हों तो रास्ते बंद नहीं होते, बल्कि हौसला उन्हें खोल देता है। संविलियन विद्यालय मंसूरनगर की शिक्षिका विजया अवस्थी इसकी मिसाल हैं।
बदहाल विद्यालय को संवारने से लेकर गांव की बेटियों के हाथों में कलम थमाने तक उन्होंने लंबा संघर्ष किया, विरोध हुआ। स्कूटी तोड़ी गई, चाकू से हमला भी हुआ, लेकिन विजया का हौसला नहीं टूटा। उनके नवाचार, जनसहभागिता और समर्पण को अब राज्य अध्यापक पुरस्कार से नई पहचान मिली है।
2010 में हुई थी पदोन्नति
2005 में प्राथमिक विद्यालय सिमौर में तैनाती के बाद 2010 में पदोन्नति पर विजया को पिहानी विकासखंड के बंद पड़े मंसूरनगर विद्यालय का प्रधानाध्यापक बनाया गया। विद्यालय की स्थिति बेहद खराब थी। बाउंड्रीवाल नहीं थी। चारों ओर अतिक्रमण था। परिसर में जानवर बांधे जाते थे।
ग्रामीणों ने विद्यालय के आसपास रास्ते बना रखे थे। विजया ने विद्यालय को अतिक्रमण मुक्त कराने की मुहिम शुरू की। विरोध का सामना करना पड़ा।
2012 में उनकी स्कूटी तोड़ दी गई। 2013 में उन पर चाकू से हमला तक किया गया। इसके बावजूद उन्होंने कदम पीछे नहीं खींचे। लगातार प्रयास कर विद्यालय से अतिक्रमण हटवाया। रास्ते बंद कराए। परिसर को सुरक्षित बनाया।
व्यवस्था सुधरने के बाद विजया ने पढ़ाई की गुणवत्ता पर ध्यान दिया। विभाग ने भी साथ दिया और उनका विद्यालय संविलियन हो गया। शिक्षक-शिक्षिकाओं की तैनाती हुई तो उन्होंने कक्षाओं को आकर्षक बनाया। फर्नीचर, टीएलएम, बाल और स्मार्ट क्लास जैसी सुविधाएं विकसित कराईं। तकनीक और नवाचार को पढ़ाई से जोड़ा।
बच्चों में वैज्ञानिक सोच, आत्मविश्वास और रचनात्मकता विकसित करने पर जोर दिया। परिणाम यह रहा कि विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या 136 से बढ़कर 360 हो गई। विजया ने बालिका शिक्षा को अपने काम का अहम हिस्सा बनाया। घर-घर जाकर बेटियों को विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित किया।
नाजिमा, फराहा समेत छह छात्राओं की पढ़ाई परिजनों ने रोक दी तो विजया ने उनका दाखिला कराया। फीस भी खुद भरी। इन बेटियों को स्नातक तक पढ़ाया। उनकी पहल से परिवारों की सोच बदली। धीरे-धीरे गांव की बेटियां उच्च शिक्षा की ओर बढ़ने लगीं। वंचित वर्ग और दिव्यांग बच्चों को भी उन्होंने शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया।
विद्यालय में जनसहभागिता बढ़ाई। वर्ष 2015 से उन्हें विभिन्न स्तरों पर सम्मान मिलते रहे। उत्कृष्ट शिक्षक पुरस्कार, राज्य स्तरीय टीचर इनोवेटर सम्मान समेत कई पुरस्कार उनके खाते में हैं। अब राज्य अध्यापक पुरस्कार के लिए चयन उनकी वर्षों की मेहनत का सम्मान है।
बीएसए प्रभात मिश्र ने उन्हें बधाई दी। खंड शिक्षा अधिकारी प्रियंका सिंह ने विद्यालय पहुंचकर शुभकामनाएं दीं। विजया की कहानी बताती है कि एक शिक्षक का संकल्प केवल विद्यालय नहीं बदलता, वह पूरी पीढ़ी की दिशा बदल सकता है।
