हापुड़ [मनोज त्यागी]। आज नदी पुत्र रमन कांत त्यागी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें तमाम तरह के संघर्षों से गुजरना पड़ा। इस संघर्ष में छोटे भाई के सहारे ने जीवन में बहुत मजबूती दी, तो कहीं न कहीं माता पिता की दुत्कार भी सहनी पड़ी। इस सबके बीच रमन कांत त्यागी ने कभी हिम्मत नहीं हारी। बस एक ही लक्ष्य तय किया कि जीना है तो समाज के लिए और निकल पड़े जल संरक्षण के लिए। काली नदी से लेकर, हिंडन नदी, नीम नदी के साथ तमाम तालाबों को पुनर्जीवित करने का काम किया।

मेरा जन्म ही समाज सेवा के लिए हुआ

नैचुरल एन्वायरन्मेंटल एजुकेशन एण्ड रिसर्च फाउंडेशन के संस्थापक रमन कान्त त्यागी ने बताया कि जब सायं को कमरे पर आकर मैंने भाई को बताया कि मुझे समाज का कार्य करना है और कोई पैसा भी नहीं मिलेगा, तो भाई (जोकि मुझसे दो साल छोटा था) ने कहा कि कोई बात नहीं मैं तो कमा रहा हूं अपना खर्चा तो चल ही जाएगा और मैंने थोड़ा सा अलग से कार्य कन्सट्रक्सन साइट को देखना भी प्रारम्भ किया है कुछ पैसा वहां से मिलेगा, आटा व अन्य रसोई का सामान गांव से आ जाएगा। तू समाज का कार्य कर ले। ये सब बातें माता-पिता को जब पता चलीं वे भी मन मसोस कर रह गए और बोले कर ले जो करना है। मैं रोजाना मोदीपुरम से अनिल राणा के पास जाता और वे रोजाना कुछ न कुछ नया कार्य मुझे करने के लिए दे देते।

विदेश जाकर बदला नजरिया

एक अजीब संयोग वर्ष 2009 फरवरी में आया कि अचानक से एक ईमेल मुझे आया कि इस्तान्बुल में 16 से 22 मार्च तक 5वां वर्ल्ड वाटर फोरम होना है। मैंने इसमें एप्लाई कर दिया। मुझे स्कालरशिप मिल गई और मुझे प्रस्तुतिकरण के लिए आमंत्रित कर लिया गया। मैंने वीजा एप्लाई किया जोकि 5 दिन में ही मिल गया।

इस्तांबुल में घूमते हुए मुझे जलपुरूष राजेन्द्र सिंह मिल गए, उन्होंने बड़े आश्चर्य से मुझसे पूछा तुम यहां कैसे आ गए? उनके अजीब से व्यवहार ने मुझे बहुत व्यथित किया। ऐसे ही एक दिन घूमते हुए कान्फ्रेंस में भारत सरकार के तत्कालीन जल संसाधन मंत्री सैफूद्दीन शोज मिल गए। जब उनसे मेरा परिचय हुआ तो बहुत खुश हुए और पूरे दिन उन्होंने मुझे अपने साथ रखा। वहां से मैं जब वापस दिल्ली आया तो एक नई सोच ने मेरे दिलो-दिमाग पर अपना स्थान बना लिया था और एक हौंसला भी मेरे अंदर भर दिया था। इसी वर्ष अक्टूबर में बैंकाक की थामासाट यूनीवर्सिटी में 7वें एशिया वाटर एण्ड एन्वारन्मेंट फोरम में भाग लेने के लिए बुलाया गया। फिर मार्च 2010 में नेपाल इंजीनियरिंग कॉलिज में वॉटर कान्फेंस में बुलाया गया। इसके बाद प्रत्येक वर्ष किसी न किसी देश से बुलावा आने लगा लेकिन पता नहीं क्या हुआ मुझे जाने का मन नही होता था।

आज भी अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर

‘वसुदैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा के साथ सक्रियता से प्रकृति संरक्षण के लिए तय किए गए उद्देश्यों की पूर्ति में लगा हूं। प्रकृति से हम पानी, भोजन व वायु सहित जो भी प्राप्त करते हैं हमें उसका मूल्य चुकाना चाहिए ऐसी मेरी अवधारण प्रारम्भ से रही है। मेरा मानना है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्य के बारे में समझ होनी चाहिए तथा प्रकृति को छति पहुंचाए बगैर विकास की अवधारणा को साकार करना चाहिए।

रमाकांत ने बताया कि मैं शिव को ही प्रकृति मानता है। शिव के सभी आयाम प्रकृति के प्रतीक हैं। इस आधार पर ही धीरे-धीरे पूर्ण मनोयोग से आगे बढ़ रहा हूं। हमारे साथ सैंकड़ों गांवों, कस्बों व शहरों के हजारों की संख्या में स्वयं-सेवक जुड़े हुए हैं। मेरा प्रमुख लक्ष्य गंगा-यमुना के दोआब की खोई पहचान को पुनः स्थापित करने का है। मैं अपने तय किए हुए लक्ष्यों की ओर सधी हुई गति, मेहनत, लगन व ईमानदारी से गतिशील हूं।

नदियों के लिए किया काम

नीर फाउंडेशन के साथ कार्य करते हुए बहुत से महत्वपूर्ण कार्य अपने हाथ में लेते हुए अपना लक्ष्य तय किया कि अब जल संवर्धन, पर्यावरण संरक्षण व नदी पुरर्जीवन का कार्य किया जाएगा। इस दौरान जहां गंगा-यमुना दोआब की छोटी नदियों के लिए तकनीकि, नीतिगत व जमीनी कार्य प्रारम्भ किया। इसमें हिण्डन, काली पूर्वी, काली पश्चिमी, कृष्णी, नागदेही, पांवधोई, धमोला, नीम व करवन नदियों का उद्गम खोजने तथा काली पूर्वी व नीम नदी के उद्गम को पुनर्जीवित करने का कार्य प्रारम्भ किया। इन नदियों की आवाज को समाज से लेकर सरकार तक पहुंचाया। अपने नदी के कार्य के आधार पर नदी पुनर्जीवन मॉडल तैयार किया। नदियों के प्रति सम्पर्ण को देखते हुए अब समाज नदीपुत्र के नाम से जानने लगे है।

उद्देश्य

मेरा उद्देश्य गंगा-यमुना की पानीदार छेत्र की खेती हुई पहचान को वापस लौटाना है। जो नीरसता देश में छोटी नदियों को लेकर है, मैं उसको दूर करने में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाना चाहता हूं तथा उस निरासा को अपने नदी पुनर्जीवन मॉडल से आशा में बदलना चाहता हूं। मेरा मानना है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति जल, नदी व पर्यावरण के सुधार में अपनी जिम्मेदारी समझते हुए अपनी सकारात्मक भूमिका निभाए। काली व नीम नदियों का पुनर्जीवन समाज में नदियों के प्रति एक चेतना पैदा अवश्य करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

Edited By: Mangal Yadav