केशव त्यागी, हापुड़

होली हो या दिवाली, ईद हो या लोहड़ी. त्योहारों पर सभी को अपनों के घर आने का इंतजार रहता है। अपने मौजूद न हो तो त्योहारों की रोशनी किसी काले अंधेरे से कम नहीं होती। विगत छह वर्ष में अपनों की तलाश में भटक रहे परिवारों को आज तक राहत नहीं मिली है। त्योहार सूने बीत जाते हैं, लेकिन अपनों के लौटने की आस में स्वजन घर की चौखट पर टकटकी लगाए इंतजार करते रहते हैं। क्योंकि, कहीं न कहीं आज भी उन्हें उम्मीद है कि एक दिन उनके परिवार का लापता सदस्य घर वापस लौटकर जरूर आएगा। वहीं सरकार समय-समय पर पुलिस को गुमशुदा की तलाश के लिए जगाती रहती है, लेकिन शायद पुलिस गहरी नींद में सो रही है।

जनपद में वर्ष 2014 से अक्टूबर 2020 तक 18 वर्ष तक की आयु के करीब 259 किशोर व किशोरियों के लापता होने के मुकदमे थानों में दर्ज हुए हैं। इनमें से 117 तो वापस आ गए, जबकि 82 किशोर और किशोरियों का अभी तक सुराग नहीं लग पाया है। पुलिस उन्हें खोजने के लिए विशेष योजना भी नहीं बना सकी है। पीड़ित स्वजन थाने और चौकियों से लेकर अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। उन्हें आश्वासन के अलावा अभी तक कुछ नहीं मिल पाया है।

कोई अपनी पुत्री की प्रतीक्षा में है तो कोई पुत्र को खोज रहा है। किसी की पत्नी लापता है, तो कोई पति की तलाश कर रही है। कहीं भाई के आने का इंतजार है, तो कोई अपनी बहन की तलाश में भटक रहा है। गुमशुदा लोगों में कुछ ऐसे हैं जिनका पुलिस पिछले कई वर्षों लापता होने का बाद भी सुराग नहीं लगा सकी है।

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पिछले पांच वर्षों में गुमशुदा और बरामदगी का आकंड़ा

वर्ष गुमशुदा पुरुष गुमशुदा महिला कुल बरामदगी सुराग नहीं

2014 118 44 79 85

2015 106 84 96 96

2016 158 114 136 136

2017 162 129 94 197

2018 210 185 104 291

2019 100 59 111 48

2020 110 60 50 75

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-क्या कहते हैं जिम्मेदार

पुलिस अधीक्षक संजीव सुमन ने बताया कि लगातार लापता लोगों की तलाश के लिए पुलिस अभियान चला रही है। जनपद में गुमशुदा लोगों की बरामदगी करने के लिए सभी थानों को पुलिस को कड़े आदेश दिए गए हैं।

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