जासं, हापुड़। विपरीत परिस्थिति में अपने काम को अवसर में बदलना कोई संतोष देवी से सीखे। जिन्होंने कोरोना काल की आपदा को अवसर में बदलकर ठप पड़े चटाई उद्योग को नई दिशा दी। संतोष देवी ने लाकडाउन के समय और अधिक उर्जा से चटाई बना डाली। अनलाक हुआ तो पटेरा घास से बनीं चटाइयों की मांग बढ़ी। दूसरे राज्यों से बंपर आर्डर मिले। लाकडाउन में बनी सभी चटाइयां बिक गईं और उन्हें अच्छा मुनाफा भी हुआ। 

गढ़मुक्तेश्वर के प्राचीन गंगा मंदिर के नीचे बसे 100 से अधिक परिवार हस्तशिल्प कारीगरी से चटाई बनाने के कारोबार से जुड़े हैं। 57 वर्षीय संतोष देवी ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा था, जिसमें इस उद्योग के संबंध में अपने द्वारा किए गए प्रयास और समस्याओं से अवगत कराया। उसी का संज्ञान लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को मन की बात में संतोष देवी के काम की सराहना की। 

संतोष देवी बताती हैं कि वह जनपद बिजनौर से पटेरा खरीदकर लाती हैं। लाकडाउन लगने से आवागमन बंद हो गया था। घर पर रहकर स्टाक में रखे पटेरा से परिवार के सदस्यों को लगाकर चटाई बना डालीं। पूरा परिवार मिलकर रोजाना 20 से 25 चटाई बना लेता है। अनलाक हुआ तो चंद दिनों में ही चटाइयां बिक गईं।

पुश्तैनी काम को दी नई धार

संतोष देवी बताती हैं कि उनके दो बेटे और एक बेटी है, जबकि एक बेटी की मौत हो चुकी है। बड़ा बेटा रविकांत घर पर ही रहकर चटाई बनाता है। छोटा बेटा दीपक साफ्टवेयर इंजीनियर है। पति रिछपाल भी चटाई बनाते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। चटाई बनाकर उन्होंने बेटे को पढ़ाया और इंजीनियर बनाया। 

ठेकेदारी प्रथा खत्म कराने की मांग

संतोष देवी की मांग है कि चटाई उद्योग से ठेकेदारी प्रथा समाप्त की जाए। उन्होंने बताया कि एक चटाई बनाने में करीब 40 रुपये का खर्च आता है। जबकि ठेकेदार उनसे सिर्फ 60 रुपये में चटाई खरीदता है। एक चटाई पर सिर्फ 20 रुपये ही बचते हैं। जबकि ठेकेदार उस चटाई को 100 और 120 रुपये में बेचकर दोगुना तक मुनाफा कमाते हैं। इस ठेकेदारी प्रथा को समाप्त करके सरकार उन्हें सीधे ग्राहक तक चटाई बेचने की सुविधा मुहैया कराए, जिससे उनका मुनाफा बढ़े। 

पटेरा घास से बनी चटाई की विशेषता

प्रयागराज, हरिद्वार, बनारस, उज्जैन, नासिक समेत विभिन्न स्थलों पर आयोजित होने वाले मेलों में पटेरा घास से बनी चटाई की मांग रहती है। इनमें गढ़ गंगानगरी से जुड़ी हस्तशिल्प कला भी अपनी अद्भुत छटा बिखेरती है। क्योंकि कल्पवास करने वाले नागा बाबाओं समेत अधिकांश साधु, संत पटेरा घास से बनी चटाई का प्रयोग करते हैं, इसलिए मेलों में गढ़ से लाखों चटाई भेजी जाती हैं।

 

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