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हापुड़ में सिस्टम है बीमार, सच्चाई से मुंह मोड़ेंगे जिम्मेदार तो कैसे सुधरेगी स्वास्थ्य व्यवस्था

Published: Thu, 28 May 2026 03:46 PM (IST)

हापुड़ जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाली, लापरवाही और अव्यवस्थाओं की मार झेल रही है, जहां मरीजों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।

डॉ. वेद प्रकाश, मुख्य चिकित्सा अधिकारी। जागरण

डॉ. वेद प्रकाश, मुख्य चिकित्सा अधिकारी। जागरण

HighLights

  1. हापुड़ में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं, दवाएं और जांच अनुपलब्ध।

  2. जिम्मेदार अधिकारी समस्याओं को स्वीकारने के बजाय दबाने में सक्रिय।

  3. अवैध क्लीनिकों और डॉक्टरों पर कार्रवाई में घोर लापरवाही।

जागरण संवाददाता, हापुड़। हापुड़ जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाली, लापरवाही और अव्यवस्थाओं की मार झेल रही है। सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों को समय पर उपचार, जांच और दवाओं जैसी बुनियादी सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हो रही हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हालात सुधारने के बजाय जिम्मेदार अधिकारी अक्सर शिकायतों को नकारने या उन्हें दबाने में अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि जब समस्याओं को स्वीकार ही नहीं किया जाएगा, तो आखिर समाधान कैसे निकलेगा?

स्वास्थ्य केंद्रों तक रोजाना पहुंच रही हैं शिकायतें

जिले के सरकारी अस्पतालों की स्थिति आम मरीजों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। सीएमओ कार्यालय से लेकर सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक रोजाना शिकायतें पहुंच रही हैं। कहीं डॉक्टर समय पर अस्पताल नहीं पहुंचते, तो कहीं मरीज घंटों लाइन में लगने के बाद भी जांच नहीं करा पाते। कई अस्पतालों में आवश्यक दवाओं का अभाव बना रहता है।

वहीं, सफाई व्यवस्था भी बदहाल है, जिससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां पीएचसी और सीएचसी स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों के कई पद खाली पड़े हैं, जिसके कारण मरीजों को मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।

स्वास्थ्य विभाग की ढिलाई का फायदा अपंजीकृत डॉक्टर और अवैध अस्पताल खुलेआम उठा रहे हैं। बिना पंजीकरण के क्लीनिक संचालित हो रहे हैं, जबकि कई अल्ट्रासाउंड और एक्सरे सेंटर बिना मानकों के काम कर रहे हैं। इन केंद्रों पर मरीजों की जान जोखिम में डालकर इलाज और जांच की जा रही है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभागीय अधिकारियों की अनदेखी और मिलीभगत के कारण ऐसे केंद्रों पर कार्रवाई नहीं हो पाती। समय-समय पर छापामारी और नोटिस की कार्रवाई जरूर होती है, लेकिन उसका असर जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं देता।

अवैध अस्पतालों पर कठोर कार्रवाई की आवश्यकता

प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए सबसे पहले सीएमओ और अन्य अधिकारियों को जमीनी सच्चाई स्वीकार करनी होगी। केवल बैठकों, निरीक्षणों और दावों से व्यवस्था नहीं सुधरेगी। अस्पतालों में नियमित मॉनिटरिंग, डॉक्टरों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने, दवाओं और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और अवैध अस्पतालों पर कठोर कार्रवाई की आवश्यकता है। जब तक जिम्मेदार लोग समस्याओं से मुंह मोड़ते रहेंगे, तब तक जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था यूं ही बीमार बनी रहेगी और इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा।

अमानवीयता पर भी गंभीरता नहीं

पिछले सप्ताह गढ़मुक्तेश्वर में अपंजीकृत चिकित्सक और अवैध अस्पताल में क्षेत्र की एक महिला की उपचार के दौरान मौत हो गई। आरोपी चिकित्सक ने महिला के स्वजन को गुमराह कर दिया और शव को गिट्टी-मिट्टी ढ़ोने वाले वाहन में डलवाकर गांव के बाहरी हिस्से पर छोड़ दिया गया।

इस मामले में जमकर हंगामा हुआ और सीएमओ ने आनन-फानन में तीन सदस्यीय टीम गठित कर तीन दिन में रिपोर्ट मांगने का फरमान जारी किया और मामले को दबा लिया। अब एक सप्ताह से ज्यादा समय हो जाने पर भी टीम ने जांच शुरू ही नहीं की है। जानकारों का कहना है कि इस मामले को जानबूझकर दबाया जा रहा है।

हमने जांच के लिए तीन सदस्यीय टीम का गठन किया था। अभी तक आरोपी चिकित्सक फरार है। उसके बयान दर्ज करने के बाद ही जांच आगे बढ़ेगी। वहीं मृतका के स्वजन ओर से पुलिस को शिकायत नहीं दी गई है। - डॉ. वेदप्रकाश, सीएमओ, कार्यवाहक