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गांधीजी ने 97 साल पहले राठ से फूंका था क्रांति का बिगुल, इसी बरामदे में जमीन पर बैठ किया था भोजन

Published: Fri, 02 Oct 2026 05:49 PM (IST)

गांधीजी ने 1929 में हमीरपुर के राठ कस्बे का दौरा किया, जहाँ उन्होंने सेठ हीरालाल अग्रवाल की हवेली में रात्रि विश्राम किया और जमीन पर बैठकर भोजन किया।

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HighLights

  1. गांधीजी ने 1929 में हमीरपुर के राठ कस्बे का दौरा किया।

  2. सेठ हीरालाल अग्रवाल की हवेली में रात्रि विश्राम कर भोजन किया।

  3. राठ से नमक सत्याग्रह का आगाज हुआ, कई क्रांतिकारी हुए गिरफ्तार।

अनुराग मिश्रा, हमीरपुर। आजादी की लौ जलाने के लिए महात्मा गांधी वर्ष 1929 में हमीरपुर के राठ कस्बे के खुशीपुरा मुहल्ले में आए थे। यहां के तत्कालीन चेयरमैन सेठ हीरालाल अग्रवाल की हवेली में गांधी ने रात्रि विश्राम किया था।

बापू ने हवेली के बरामदे में जमीन पर बैठकर भोजन भी किया था और यहीं से महात्मा गांधी ने आजादी के लिए जोश भरा था। उन्होंने हजारों की संख्या में मौजूद लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन करने का आवाह्न किया था।

बुंदेलखंड के कई जिलों में अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए क्रांतिकारियों को लामबंद करने के लिए महात्मा गांधी ने यहां पहली बार हुंकार भरी थी। राठ पहुंचे महात्मा गांधी ने पं. परमानंद खरे, दीवान शत्रुघ्न सिंह, श्रीपथ सहाय समेत तमाम क्रांतिकारियों से भेंट की।

गांधी जी ने जनसभा के जरिए क्रांतिकारियों और नवयुवकों में आजादी की लड़ाई के लिए ऐसा जोश भरा था कि उनके जाने के बाद समूचे इलाके में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन तेज हो गए थे। नगर पालिका अध्यक्ष सेठ हीरालाल अग्रवाल व कस्बे के लोगों ने महात्मा गांधी को ताम्रपत्र भेंट किया था। जिसे गांधी जी ने जाते समय सेठ हीरालाल को दे दिया था।

बापू के स्वागत में रास्ते में बरसाए गए थे फूल

महात्मा गांधी तत्कालीन चेयरमैन हीरालाल अग्रवाल की हवेली पर गए थे। महात्मा गांधी के कस्बे में आने पर उनके स्वागत, सत्कार के लिए रास्ते में फूल बरसाए गए थे। हवेली के अंदर बने गोल चबूतरे से अंग्रेजी हुकूमत में जकड़े देश को आजादी दिलाने के लिए लोगों में जोश भरा था। बापू को देखने और उनके भाषण को सुनने के लिए हजारों की संख्या में लोग उमड़े थे।

जवाहरलाल नेहरू ने भी सम्मेलन में लिया था भाग

महात्मा गांधी के प्रवास के बााद क्रांतिकारी समूचे बुंदेलखंड में संपर्क कर सभी को एकजुट करने में लग गए। 1937 में राठ क्षेत्र के बेतवा नदी किनारे बसे जराखर गांव को सम्मेलन के लिए चुना गया। इस सम्मेलन में पं. जवाहरलाल नेहरू समेत देश के नामचीन क्रांतिकारियों ने भाग लिया।

डाॅ. राम मनोहर लोहिया को भी सम्मेलन में भाग लेना था, लेकिन वह नहीं पहुंच सके थे। कांग्रेस की पूर्णिमा बनर्जी ने डा.लोहिया की अनुपस्थिति में उनका भाषण पढ़ क्रांतिकारियों में जोश भरा। जराखर गांव में आज भी किलों के अवशेष हैं। जहां आजादी के दीवाने बैठकर अपनी योजनाएं बनाते थे।

बापू के जाने के बाद राठ से हुआ था नमक सत्याग्रह का आगाज

राठ से महात्मा गांधी के जाने के बाद नमक सत्याग्रह आंदोलन का आगाज राठ कस्बे से हुआ था। पं. बैजनाथ तिवारी ने नमक बनाकर कानून का उल्लंघन किया तो उन्हें गिरफ्तार कर छह माह की सजा देकर बांदा जेल भेजा गया था। पुलिस ने भी आंदोलन करने वालों पर डंडे बरसाए थे। इस आंदोलन में भाग लेने पर 372 लोगों को कारावास की सजा देकर जुर्माना किया गया था।

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