300 से शुरू हुआ सफर 75 हजार तक पहुंचा, हमीरपुर के इस गांव में 110 साल से चली आ रही रामलीला
हमीरपुर के उमरी में भर्राहा तालाब के पास स्थित प्राचीन राम-जानकी मंदिर में 110 वर्षों से रामलीला की परंपरा चली आ रही है।

110 साल से चली आ रही रामलीला।
HighLights
हमीरपुर में 110 वर्षों से चली आ रही रामलीला परंपरा।
शुरुआती ₹300 का खर्च अब ₹75,000 तक पहुंचा।
ग्रामीणों द्वारा सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का प्रयास।
जागरण संवाददाता, हमीरपुर। विकासखंड उमरी के भर्राहा तालाब के पास स्थित प्राचीन राम-जानकी मंदिर में करीब 110 वर्षों से रामलीला के आयोजन की परंपरा चली आ रही है।
परंपरागत रूप से रामलीला का आयोजन पूस पूर्णिमा से शुरू होता था। समय के साथ आयोजन का स्थान और स्वरूप बदलता गया। शुरुआती समय में जिस रामलीला में तीन सौ खर्च होते थे, उसमें आज 75 हजार का खर्च आ रहा है। लेकिन ग्रामीणों ने इस पुरानी परंपरा को अभी भी कायम रखा है।
रामलीला कमेटी के पूर्व संरक्षक अरिमर्दन सिंह ने बताया कि राम-जानकी मंदिर गांव से दूर होने के कारण वर्ष 1954 से रामलीला का आयोजन गांव के सईराहा ग्वाणा में किया जाने लगा। शुरुआती दौर में महज 300 रुपये के खर्च में दो दिन में रामलीला पूरी हो जाती थी।
इंटर कॉलेज में शुरू हुआ था रामलीला
उस समय गांव के स्थानीय लोग ही रामलीला में विभिन्न पात्रों की भूमिका निभाते थे। रामलीला देखने के लिए आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते थे। बाद में गांव में जगह की कमी होने के कारण रामलीला का मंचन शाश्वत शांति इंटर कॉलेज के परिसर में शुरू किया गया।
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वर्तमान में भी यहीं रामलीला का आयोजन किया जाता है। रामलीला संचालक अनिल कुमार पालीवाल ने बताया कि रामलीला आयोजन के लिए ग्राम समाज की सात बीघा जमीन आवंटित है। इस जमीन से होने वाली आय और ग्रामीणों से मिलने वाले चंदे से रामलीला का आयोजन किया जाता है।
75 हजार रुपये खर्च आता है रामलीला का
बताया कि पहले कम खर्च में आयोजन हो जाता था। लेकिन अब महंगाई के कारण करीब 75 हजार रुपये तक खर्च आता है। बताया कि समय के साथ नवयुवकों में रामलीला के प्रति रुचि कम हुई है। इसका असर दर्शकों की संख्या पर भी पड़ा है और पहले की अपेक्षा अब दर्शकों की संख्या काफी कम रह गई है।
पूर्व रामलीला कलाकार राजेश शुक्ला ने बताया कि पहले लोगों में रामलीला के प्रति गहरी आस्था थी और ग्रामीण कलाकार उत्साह से मंचन करते थे। अब रामलीला के आयोजन में व्यावसायिकता बढ़ी है। वहीं रामलीला में अभिनय करने वाले कलाकारों के लिए इससे आजीविका चलाना भी कठिन हो गया है।
गांवों में अब विशेष पर्व, मेले या अन्य अवसरों पर ही रामलीला का आयोजन अधिक देखने को मिलता है। इसके बावजूद ग्रामीणों का प्रयास है कि वर्षों पुरानी इस सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाए।
