जागरण संवाददाता, महोबा: आबादी बढने के साथ ही अधिक उत्पादन लेने की होड़ में आज किसान पुरानी कृषि पद्धतिओं से दूर हो गया है। इससे धरती माता, गोमाता व अपनी मां कुपोषण की शिकार हो गई हैं। बुंदेलखंड के इस त्रिकुपोषण से निपटने के लिए किसान को विषमुक्त, जैविक कृषि को अपनाना होगा। यह बात प्रो. सत्यव्रत द्विवेदी, अधिष्ठाता उद्यानिकी महाविद्यालय, बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय ने ग्राम दादरी में कही।

यह बात कृषि विज्ञान केन्द्र की ओर से आयोजित बुंदेलखंड क्षेत्र में जैविक कॉरीडोर के नीति निर्धारण मंथन कार्यक्रम में उभर कर आई। कार्यक्रम में केन्द्र के अध्यक्ष डॉ. मुकेश चंद्र ने बताया कि बुंदेलखंड किसान शशक्तिकरण अभियान के तहत बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. यूएस गौतम के निर्देश में चलाये जा रहे जैविक कॉरीडोर अभियान के तहत जनपद के प्रत्येक विकासखंड से दो गांवो का चयन किया गया है। जिसमें प्रत्येक गांव से जैविक खेती में रूचि रखने वाले 15 किसानों का चयन कर उन्हें जागरूक बनाया जा रहा है। इस अवसर पर सहायक निदेशक डॉ. बीके गुप्ता ने बताया कि इसके अंतर्गत बुंदेलखंड के सभी सात जिलों में जैविक खेती को बढावा देने के लिए जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। जैविक खेती में मृदा की भूमिका पर मृदा विज्ञान विभाग के डॉ. जगन्नाथ पाठक ने स्थायी कृषि उत्पादन प्राप्त करने के लिए मृदा के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा में सुधार आवश्यक है। जो कि सूक्ष्म जीवों के उपस्थिति द्वारा ही संभव है। जैविक स्त्रोत का उपयोग मृदा स्वास्थ्य में सुधार लाने में आवश्यक है। इस अवसर पर विजय कुमार चैरसिया, जिला उद्यान अधिकारी, पादप सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. चंचल सिंह, पादप सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. सुनील कुमार, सस्य वैज्ञानिक डॉ. गौरव, तथा डॉ. बृजेश पाण्डेय ने विचार व्यक्त किए।

Posted By: Jagran

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