गोरखपुर, जेएनएन। हूटर वाले दारोगा जी इन दिनों खूब चर्चा में हैं। वह शहर की सबसे पुराने थाने की सबसे छोटी चौकी पर तैनात हैं। इतनी छोटी की एक चहारदीवारी के दायरे में सिमटी हुई है। धरना-प्रदर्शन पर बैठे लोगों को संभालने के अलावा उनके जिम्मे कोई खास काम नहीं है, लेकिन हूटर के चलते खूब चर्चा में हैं। अपनी बुलेट में उन्होंने हूटर लगवा रखा है। बुलेट स्टार्ट करने के साथ ही हूटर भी बजा देते हैं। तभी सड़क पर निकलते हैं। इसीलिए लोग उन्हें हूटर वाले दारोगा जी कहने लगे हैं। इससे पहले भी चर्चा में रहने के लिए कुछ दारोगा अनूठा रास्ता अपनाते रहे हैं। मसलन एक हाकी वाले दारोगा थे। हर समय हाकी लेकर चलने की वजह से चर्चा में रहते थे। फिर हेलमेट वाले दारोगा जी का दौर आया। हर समय हेलमेट लगाए रखना उनकी खासियत थी। अब हूटर वाले दारोगा जी का दौर शुरू हुआ है।

यह इश्क-इश्क है

वर्दी वाले महकमे के इलाकाई प्रभारी हैं। रहने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं, इसलिए यहां के माहौल में घुलने-मिलने में उनके सामने खासी मुश्किल पेश आती है। इसीलिए पहले हर समय उनका मूड उखड़ा-उखड़ा रहता था। कुछ दिन पहले अचानक उनके व्यवहार में बदलाव आने लगा। इस बदलाव को जल्दी ही मातहत भी महसूस करने लगे, लेकिन यह किसी को हजम नहीं हो रहा था। हर बात की तह में जाने की आदत से मजबूर मातहत इसकी वजह पता लगाने में जुट गए। वजह जब सामने आई तो महकमे में नमक-मिर्च लगाकर इसकी चर्चा भी शुरू हो गई। चलते-चलते बात अधिकारियों तक पहुंच गई। उनके बीच भी प्रभारी के व्यवहार में आया बदलाव चर्चा का विषय बन गया। बात खबरनवीसों तक पहुंची तो वह भी जड़ तक पहुंचने की कोशिश में लग गए। बहुत प्रयास करने पर एक वर्दीधारी ने इशारों-इशारों में बस इतना ही कहा, यह इश्क-इश्क है।

संतोषजनक से असंतोष

वर्दी वाले महकमे से ताल्लुक रखते हैं। कंधे पर पीले रंग के तीन सितारे धारण करते हैं। जल्दी ही पद पढऩे वाला है। इसके बाद सितरों का रंग पीला से सफेद हो जाएगा, लेकिन इस राह में चरित्र पंजिका बाधा बनकर खड़ी हो गई है। चरित्र पंजिका में उनके सेवाकाल का इतिहास दर्ज है। इसमें कई जगह अनुकूल तो कई जगह प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज है। पदोन्नति का वक्त आया तो चरित्र पंजिका लिखने वाले अफसर ने रहमदिली दिखाते हुए इस साल की प्रविष्ट में संतोषजनक लिख दिया। सितारों वाले साहब को पता चला तो वह परेशान हो गए। उन्हें लग रहा है कि चरित्र पंजिका में दर्ज प्रतिकूल प्रविष्टि भारी पड़ जाएगी। इस बाधा को दूर करने के लिए सितरों उन्होंने नेताओं व अधिकारियों की परिक्रमा करनी शुरू की। संतोषजनक लिखे जाने पर असंतोष व्यक्त करते रहे। उनकी कोशिश है कि किसी तरह से चरित्र पंजिका पर एक्सीलेंट लिख जाय।

कब रुकेगा कच्ची का काला कारोबार

जनपद में कच्ची का कारोबार कोढ़ की तरह हो गया है। चंद रुपयों के लिए इसका धंधा करने वालों से पुलिस की मिली भगत कोढ़ में खाज का काम कर रही है। इसी गठजोड़ के चलते जानलेवा शराब का कारोबार रात-दिन खूब फलफूल रहा है। तब जबकि यूरिया व नौसादर की मदद से महुआ सड़ाकर तैयार होने वाली यह शराब लोगों के लिए जानलेवा साबित होती है। हालांकि जिम्मेदार लोग शराब पीने से मौत होने की बात कभी स्वीकार नहीं करते, लेकिन इसके नियमित सेवन से जान गंवाने वालों के करीब-करीब हर गांव की गलियों में घूमते अनाथ बच्चे और कम उम्र में ही विधवा होकर जिंदगी के लिए जिद्दोजहद करती महिलाओं को देखकर इसकी विभिषिका का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। समय-समय पर पुलिस इसे रोकने की कोशिश का दिखावा करती है, लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम रह जाता है कि आखिर कब रुकेगा काला कारोबार?   

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