दुर्गेश त्रिपाठी, गोरखपुर । कोरोना संकट से पहले जिन्हें तलाशना मुश्किल होता था, वह सफाई महकमे के दूसरे नंबर वाले साहब आज खुलकर मोर्चा ले रहे हैं। कोरोना वायरस से शहरियों को बचाने में तन्मयता से जुटे हैं। दवा और पाउडर की व्यवस्था के लिए खुद भागदौड़ भी कर रहे हैं। इतना ही नहीं महकमे के वजूद पर संकट की स्थिति आयी तो साहब छोटा हाथी पर सवार होकर पड़ोसी जिले में पहुंच गए। वहां के साहबों से बात की और सामान लेकर चले आए। अपने संपर्कों को जगाकर साहब ने सफाई महकमे को कई सामान मुफ्त में भी दिला दिए। साहब पूरे दिन फील्ड में रहते हैं और लोगों को कोरोना से बचने के लिए जागरूक भी करते हैं। साहब की यह तेजी उत्तरी ध्रुव की तरह दूसरी छोर पर रहने वालों को भले रास नहीं आ रही है, लेकिन अपनों में किशन-कन्हैया के रूप में प्रसिद्ध साहब अपने काम में जुटे हैं।

हुजूर को हुआ अपनी दबंगई का एहसास

सफाई महकमे के एक छोटे माननीय को गलतफहमी थी कि वह भी दबंग टाइप के हैं। क्या मजाल कोई उनकी बात टाल दे। वह इतने ओवरकांफिडेंस में आ गए कि दफ्तर में चेले से संदेश भेजवा दिया। चेले ने हुजूर की दबंगई के किस्से बताए और संदेश सुनाया कि फलां जगह तक छिड़काव हो जाना चाहिए। संदेश सुनने वाले ने बेपरवाही में सिर हिला दिया। चेला आकर बता गया कि हुजूर का संदेश मुलाजिमों तक पहुंचा दिया गया है। एक-एक कर दिन बीतने लगे, लेकिन छिड़काव गाड़ी की कौन कहे हाथ वाली मशीन भी नहीं पहुंची, तो हुजूर को अपनी दबंगई का एहसास हो गया। इसके बाद उन्होंने एक साहब को फोन मिलाया। अपने वजूद का हवाला दिया तो साहब भी पसीज गए। नीचे वालों को निर्देशित किया तो थोड़ी देर में मशीन घरों के सामने फुहारें बरसाने लगी। कोरोना से सहमे छोटे माननीय छिड़काव के बाद ही बाहर निकले।

खौफ में माननीय जनहित भूले

कोरोना का कहर शुरू होने से पहले जनता से जुड़ी समस्याओं के लिए अफसरों के सिर पर सवार रहने वाले शहर के कई छोटे माननीय इन दिनों गायब हैं। हमेशा जनहित की लड़ाई में आगे रहने वाले कोरोना से इतना डर गए हैं कि अपनी जनता को ही भूल बैठे हैं। कोरोना वायरस से बचाव के लिए घरों में रह रहे भूख से बेहाल लोगों को उम्मीद थी कि माननीय आएंगे, उनके लिए भोजन का इंतजाम करेंगे। लेकिन जनता कफ्र्यू, फिर लॉकडाउन का आधा से अधिक समय कटने के बाद भी छोटे माननीय गायब हैं। बाहरी मदद कर रहे हैं, लेकिन जिन्हें वोट दिया, उनके दर्शन पाने के लिए आंखें पथरा गई हैं। एक छोटे माननीय तो ऐसे हैं कि अफसर भी उनकी मुस्कान से सिहर जाते हैं। वह बातें हमेशा जनता की करते हैं, लेकिन विपत्ति की इस घड़ी में वह भी न जाने कहां गायब हो गए हैं।

चौकियां सलामत, बच गई इज्जत

कोरोना वायरस के खौफ से लोग परेशान हैं, लेकिन खाकी की तो इज्जत बच गई। शहर के नुक्कड़ों, यहां तक कि वर्दी वालों के लिए बनी चौकियों के बगल लोहे से बनी चौकियां अभी सही सलामत हैं। इन लोहे की चौकियों पर लगे विज्ञापन को देखने वाला भले ही इस समय कोई न हो, लेकिन यदि कोरोना वायरस नहीं आता, तो यह विज्ञापन कबाड़ में पड़े होते। सफाई महकमे ने जब तक अपना अधिकार पूरी तरह समझा, काफी देर हो चुकी थी। खाकी वर्दी पहनकर लोगों को हेलमेट पहनाने वाले साहब अब खुश हैं और विज्ञापन का कांसेप्ट समझाकर महकमे की फजीहत करा चुके लोग भी संतुष्ट हैं। साढ़े सात लाख का बकाया अब तक नौ लाख के आंकड़े को पार कर चुका होता। यह तो तय है कि कोरोना जाने के महीनों बाद ही सफाई महकमे को अपना अधिकार याद आएगा। तब तक लाखों का वारा-न्यारा हो चुका होगा।

Posted By: Satish Shukla

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