जितेंद्र पांडेय, गोरखपुर। दिन के 11 बजे थे। चंदू चाचा बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ रहे थे। क्यों मारा है। गुंडागर्दी है क्या? अभी थानेदार साहब से कहता हूं। रोज की मनमानी खत्म करवा दूंगा। समय बदल गया है। ऐसे ही हड़प लेंगे किसी की जमीन। कोई अकारण क्यों मारे। चाचा किसी तरह थाने पहुंचे। वहां उनसे पहले एक बुजुर्ग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे थे। साहब मेरा बेटा मुझे रोजाना मारता है। यह देखिए कितना मारा है। खून निकल रहा है। तभी उनका बेटा बोल पड़ा। साहब यह झूठ बोल रहा है। थानेदार साहब ने दोनों को बूट से कूटा। दोनों को हवालात में डाल दिया। दारोगा जी को निर्देश दिया कि दो घंटे बाद दोनों को छोड़ देना। दारोगा ने चाचा से आने की वजह पूछी। चाचा बोले, कुछ नहीं साहब दर्शन के लिए। चाचा बाहर निकलते ही बोले, अच्छा हुआ जो सिर्फ गालियां ही मिलीं। शिकायत करता तो मार बोनस में मिलती।

विकास वाला विभाग, कोरोना में हिसाब

विकास वाले विभाग पर भी कोरोना का प्रकोप दिखा। एक साथ 55 लोग पॉजिटिव। कार्यालय को चार दिन के लिए बंद कर दिया गया था। जानकारी के अभाव में चौथे दिन मैं कार्यालय पहुंच गया, तो पता चला कि इंजीनियर साहब एक उपभोक्ता से हिसाब-किताब में लगे थे। मामला नक्शे से जुड़ा था। मुझे देखकर वह चौके और बोले आप कौन, कहां से आए हैं। परिचय के बाद वह हिसाब-किताब समेटते दिखे, लेकिन उनके उपभोक्ता को शायद बात समझ में नहीं आयी। उन्हेंं लगा, कहीं रकम कम होने के कारण तो साहब बाद में आने को नहीं कह रहे हैं। उपभोक्ता फिर कहने लगा कि साहब नक्शे के लिए आपने इतना ही कहा था। साहब उसे डांटते हुए बोले कि कोरोना के कारण कार्यालय बंद चल रहा है और तुम्हें नक्शे की पड़ी है। देख नहीं रहे, मैं भाई साहब से बात कर रहा हूं। जाओ दो दिन बाद आना।

चलो गांव, यहां बहुत खतरा है

रमई काका बुधवार की सुबह घर का सामान पैक कर रहे थे। काकी ने पूछा तो बोले गांव जाना है। काकी बोलीं कि क्या गांवों में कोरोना नहीं है। काका बोले, डर कोरोना से नहीं है। उसे तो रात वाली शीशी से भगा दूंगा, लेकिन शहर में अपनी जान कैसे बचाऊंगा। काकी बोलीं कि शहर में इतनी पुलिस। इतने लोग, यहां भला क्या खतरा है। अब पहले वाला गोरखपुर नहीं रहा। काका बोले, वही तो मैं भी कह रहा हूं। यहां हत्याएं पहले भी होती थीं। वजहें बड़ी थीं। शहर में दो ही माफिया थे और दोनों के लोग एक-दूसरे को मारते थे, लेकिन अब तो हर गली में माफिया हैं। एक साथ दो-दो लोगों को गोली मारी जा रही हैं। सड़क पर लोगों को दौड़ाकर गोली मारी जा रही है। यहां तो हत्याओं की कोई वजह ही नहीं है। पुलिस के सामने ही लूटेरे दनादन गोलियां चला रहे हैं।

संस्कार वाला स्कूल, शिक्षकों को गया भूल

इस बार तो लालू के चाचा उससे मिलने शहर गए तो उसे देखकर एकदम अवाक रह गए। उसने आते ही चाचा के पांव छुए। पढऩे बैठ गया। चाचा बोले अच्छे स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने का यही लाभ है। इनमें कितना बदलाव दिख रहा है। पढ़ाई के साथ-साथ बच्चे संस्कारित भी दिख रहे हैं। तभी बच्चों की मम्मी बोलीं, कैसा संस्कार। इनके स्कूल के शिक्षक पिछले 14 दिन से कोरोना से बीमार हैं। उनकी तबीयत इतनी बिगड़ी कि उन्हेंं लखनऊ रेफर किया गया है। उनकी बेटी अभी छोटी है। उस बेचारी की भी देखभाल नहीं हो पा रही है। कोरोना के चलते ही दो दिन पहले उनकी पत्नी की मौत हो गयी। बेचारे पत्नी के अंतिम दर्शन तक नहीं कर सके। कई माह से स्कूल ने उनका वेतन भी नहीं दिया है। इस स्थिति में भी स्कूल से कोई नहीं पूछ रहा है कि उनका उपचार कैसे हो रहा है।

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