काशिफ अली, गोरखपुर: कथाकार मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी रचना 'ईदगाह आज भी सबके जेहन में है। कम ही लोगों को पता है कि वह कहानी मुंशी जी ने गोरखपुर रिहाइश (निवास स्थान) के दौरान लिखी थी। वह ईदगाह कोई और नहीं बल्कि मुबारक खां शहीद की मजार के सामने वाली ईदगाह है, जो मुंशी जी के आवास के पिछले हिस्से में आज भी मौजूद है। आमतौर पर हर ईद पर यहां मेला लगता है और ऐसे ही एक मेले में उन्हेंं हामिद जैसा पात्र मिला था। पर इस बार कोरोना की वजह से इस ईदगाह में न कोई मेला लगेगा और न ही कोई हामिद आएगा। इस बार ईद पर यहां केवल वह पांच लोग नजर आएंगे, जिन्हेंं नमाज अदा करने की रस्म अदायगी करनी है।

कोरोना काल में इस बार की ईद कई मायनों में अलग होगी। मुंशी प्रेमचन्द की विश्व प्रसिद्ध कहानी 'ईदगाह भी उनके मशहूर किरदार 'हामिद को घर पर ही रहने को आगाह करती नजर आएगी। यह वही मासूम हामिद है जिसने ईद के दिन इसी ईदगाह पर लगने वाले मेले से बुजुर्ग दादी के लिए चिमटा खरीदा था, ताकि खाना बनाते समय उनका हाथ न जले। आज वह कोरोना इफेक्ट की जद में है। फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन करने को भी प्रतिबद्ध है।

ईदगाह में ईद का मेला

यूं तो शहर में कई ईदगाह हैं, लेकिन ईद का भव्य मेला ईदगाह मुबारक खां शहीद में ही लगता है। हामिद जैसे तमाम लोग अपनी खुशी तलाशते यहां आते हैं, इस बार मेले को कोरोना की नजर लग गई है। पर, खुदा के नेक बंदों को यह उम्मीद जरूर है कि अगली बार ईद की रौनक से ईदगाह गुलजार होगा।

कभी सोचा भी नहीं था

मुबारक खां शहीद ईदगाह के इमाम मौलाना फैजुलल्‍लाह का कहना है कि कभी सोचा भी नहीं था कि इस ईदगाह में सिर्फ चार लोगों के साथ ईद की नमाज अदा करनी होगी, लेकिन अल्लाह की मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती। इस बार अल्लाह का पैगाम है कि हमें घर में रहकर ही ईद की जगह शुक्रराने की नमाज अदा करनी है।  

Posted By: Satish Shukla

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