गोरखपुर (जेएनएन)। जिस गांव से निकलकर टेराकोटा की कलाकृतियां आज विश्व पटल पर छाई हुई हैं उस गांव को भुलाया जा रहा है। गांव की खराब होती जा रही सड़कों ने गुलरिहा में नया बाजार बनने का अवसर दे दिया है। अफसर भी अब गुलरिहा में ही आयोजन कर शहर लौट आते हैं। बाप-दादा के जमाने से टेराकोटा कलाकृति बनाकर देश का नाम रोशन और परिवार का भरण-पोषण करने वाले कलाकार अपनी माटी से भुलाने से दुखी हैं।

टेराकोटा को पहचान दिलाने में कुम्हारी कला पोखरे का महत्वपूर्ण योगदान है। इसी पोखरे की मिट्टी से वर्ष 1914 में विजय प्रजापति ने टेराकोटा कला की शुरुआत की थी। राजस्व विभाग ने पोखरे को गाव के 15 टेराकोटा हस्तशिल्पियों के नाम से आवंटित भी कर दिया है। 16 साल पहले पोखरे का सुंदरीकरण भी कराया गया था। यह पोखरा भी औरंगाबाद में ही है लेकिन अब अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। औरंगाबाद के लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह को प्रदेश स्तर पर पहचान मिल चुकी है।

सीएम की पहल से आई तेजी

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने टेराकोटा शिल्प को आगे बढ़ाने के लिए कई कार्य किए हैं। हस्तशिल्पियों को अनुदान के साथ ही इसे एक जिला एक उत्पाद में भी शामिल किया है। पिछले दिनों भटहट के पटेल स्मारक इंटरमीडिएट कॉलेज के मैदान में विकास योजनाओं के शिलान्यास एवं लोकार्पण कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंच से क्षेत्र के औरंगाबाद के विश्व प्रसिद्ध टेराकोटा के हस्तशिल्पियों को बधाई भी दी थी। इससे हस्तशिल्पियों में उत्साह की लहर थी लेकिन जब अफसरों ने दौरा शुरू किया तो वह औरंगाबाद की जगह गुलरिहा तक ही जाने लगे।

यह है हस्तशिल्पियों की पीड़ा

राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हस्तशिल्पी लक्ष्मी प्रजापति का कहना है कि टेराकोटा का नाम आने पर लोगों के जेहन में औरंगाबाद का नाम जरूर आता है। लेकिन अब अफसरों ने औरंगाबाद को किनारे कर दिया है। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में भी औरंगाबाद का टेराकोटा का नाम लिया था। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हस्तशिल्पी गुलाब प्रजापति का कहना है कि 1979 में टेराकोटा हस्तशिल्प के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। कई बार विदेशों में जाकर टेराकोटा की कला का प्रदर्शन कर देश का नाम रोशन करने का मौका भी मिला। औरंगाबाद की उपेक्षा से व्यथित हूं। औरंगाबाद की ग्राम प्रधान माडवी देवी का कहना है कि औरंगाबाद के हस्तशिल्पियों से ही प्रशिक्षण लेकर आसपास के गावों में टेराकोटा का व्यवसाय शुरू हुआ। एक जिला एक उत्पाद में शामिल होने के बाद इस कला के विकास को पंख लगे हैं लेकिन सरकारी तंत्र के रवैये से शिल्पी दुखी हैं।

टूटती और चटकती नहीं हैं कलाकृतियां

औरंगाबाद में 90 परिवार टेराकोटा कलाकृति बनाते हैं। यहां के तालाब की मिट्टी की खासियत यह है कि इससे बनी कलाकृतिया टूटती एवं चटकती नहीं हैं। यहा की मिट्टी रबड़ की तरह होती है। तापमान अधिक हो या कम कलाकृति जस की तस रहती है।

उपेक्षा की बात गलत

उद्योग विभाग की उपायुक्त उद्योग पूजा श्रीवास्तव का कहना है कि औरंगाबाद के हस्तशिल्पियों की उपेक्षा की बात गलत है । भारत सरकार की टीम क्लस्टर के लिए भूमि देखने गुलरिहा गई थी। आसपास के घरों में बनाई जा रही टेराकोटा की कलाकृतियों को भी देखा था। औरंगाबाद के हस्तशिल्पी ने क्लस्टर के कार्य में रुचि नहीं ली थी। ओडीओपी योजना के अंतर्गत सभी हस्तशिल्पियों का विकास होना है। किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

Posted By: Jagran