जागरण संवाददाता, सौरभ कुमार मिश्र। दिव्‍यांगता जीवन में दुश्‍वारियां बढ़ा देती है। कई बच्‍चे जन्‍म से ही दिव्‍यांग होते हैं। उपचार से उनकी दिव्‍यांगता दूर की जा सकती है, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर माता-पिता के लिए उपचार का खर्च उठाना कठिन हो जाता है। ऐसे परिवारों के लिए मेडिकल कालेज से संबद्ध देवरिया जिला अस्‍पताल में संचालित क्लब फुट क्लीनिक वरदान बना गया है।यहां कार्यरत सर्जन डा. शुभलाल शाह जन्‍मजात दिव्‍यांग बच्‍चों की दिव्‍यांगता आपरेशन के जरिए ठीक करने के मीशन में जुटे हुए हैं। शून्‍य से एक साल के 35 बच्‍चों काे तीन माह के अंदर आपरेशन वह ठीक कर चुके हैं।

प्राइवेट में 40 हजार से अधिक आता है खर्च

जिला अस्पताल में हो रहे प्लास्टर व आपरेशन का कार्य निश्शुल्क होता है लेकिन प्राइवेट अस्‍पतालों में एक मरीज के इलाज पर चालीस हजार से अधिक का खर्च आता है। जिला अस्‍पताल में जनपद के लोगों के साथ ही साथ बिहार के सीमावर्ती जिलों गोपालगंज व सिवान से भी मरीज यहां आ रहे हैं और निश्‍शुल्‍क उपचार करा रहे हैं। दिव्‍यांग बच्‍चे के जन्‍म लेने से निराश दंपतियों के चेहरे पर डा. शुभलाल मुस्‍कान लाने में सफल हो रहे हैं। इससे देवरिया जिले के साथ ही साथ आसपास के जिलों और पड़ोसी राज्‍य विहार में भी उनकी ख्‍याति तेजी से फैल रही है।

ऐसे तलाशे जाते हैं मरीज, प्रत्येक शुक्रवार को होता है आपरेशन

2019 से एनएचएम के तहत शुरू हुआ। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के अंतर्गत जिले में मिरेकल फीट इंडिया के सहयोग से जिला अस्पताल में संचालित क्लब फुट क्लीनिक के जरिये जन्मजात टेढ़े पंजों का निश्शुल्क इलाज किया जा रहा है। शुरुआत में जागरूकता का अभाव था। कोरोना के कारण अस्पताल बंद रहने के कारण एक दो महीने ही कार्य हुआ। इधर तीन माह से इस पर विभाग ने ध्यान दिया है। आरबीएसके टीम सीएचसी, पीएचसी, प्राथमिक स्कूलों से जानकारी लेने के बाद बच्चों की जांच व चिह्नित कर उन्हें जिला चिकित्सालय देवरिया ले आती है। प्रत्येक शुक्रवार को यहां आपरेशन व इलाज होता है।

इस तरह होता है इलाज

इस प्रक्रिया में बच्चे को प्लास्टर पोंसेटि तकनीक के माध्यम से टेनोटामी की जाती है और फिर उन्हें विशेष प्रकार के जूते पहनाए जाते हैं। क्लबफुट एक प्रकार की पैर से संबंधित जन्मजात विकृति है। यह कुपोषण व आनुवांशिकता के कारण होता है। शिशु को सप्ताह में एक दिन आठ से 10 सप्ताह तक प्लास्टर करना पड़ता है। इस बीच आवश्यकतानुसार चिकित्सक आपरेशन करते हैं और 21 दिन बाद मरीज को जूता दिया जाता है। यह जूता पांच वर्ष तक पहनना पड़ता है।

सही समय पर इलाज नहीं होने पर दिव्यांग हो जाते हैं बच्चे

इलाज के बाद साप्ताहिक कास्टिंग का उपयोग करते हुए पैर के क्रमिक सुधार की प्रक्रिया को पोंसेटि तकनीक कहा जाता है। इसमें विशेष जूते और बार के उपयोग की भी आवश्यकता होती है जिसे मिरेकल फीट इंडिया निश्शुल्क उपलब्ध कराता है। बच्चों का इलाज सही समय पर नहीं कराया गया तो वह आगे चलकर दिव्यांगता की श्रेणी में आ जाते हैं।

क्या कहते हैं चिकित्सक

मरीजों का आपरेशन कर रहे आर्थोपेडिक सर्जन डा. शुभलाल शाह कहते हैं कि शिशु के एक पैर या दोनों पैरों में लक्षण दिखाई दे सकता है। पैर की मांसपेशियों को पैर की हड्डियों से जोडऩे वाले टेंडन्स के छोटे और तंग होने के कारण यह विकृति होती है। जिसके कारण शिशु का पैर अंदर की तरफ मुड़ जाता है। इसका इलाज बच्चे के जन्म के पांच से सात दिन बाद या एक वर्ष तक बच्चे के पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद ही शुरू किया जाता है।

Edited By: Navneet Prakash Tripathi