गोरखपुर, जेएनएन। हथकरघा और पावरलूम पर काम करने वाले सैकड़ों बुनकरों को पहले हालात ने मालिक से मजदूर बना दिया। और, अब कोरोना काल की मजबूरी में रोजी-रोटी भी छिनती जा रही है। काम की कमी के चलते बुनकरों के घरों के चूल्हे ठंडे पडऩे लगे हैं।

चार माह में तीन सौ से ज्यादा पावरलूम हुए बंद

कोरोना काल के बीते चार माह में तीन सौ से ज्यादा पावरलूम बंद हैं या सप्ताह में बमुश्किल दो दिन ही चल पा रहे हैं। शहर के बुनकर बाहुल्य इलाकों रसूलपुर, जाहिदाबाद, अजय नगर, नथमलपुर, पुराना गोरखपुर एवं नौरंगाबाद में पावरलूम की खटर-पटर अब कम सुनी जा रही है। गोरखपुर में कभी कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला व्यवसाय था हथकरघा और पावरलूम। शहर के 14 मोहल्लों में तकरीबन एक लाख लोग इससे जुड़े हुए थे। नब्बे के दशक में गोरखपुर में करीब साढ़े आठ हजार पावरलूम थे।

हैंडलूम कार्पोरेशन बंद होत ही शुरू हुए बुरे दिन

बुनकरों की हालत 1990 के बाद तबसे खराब होनी शुरू हुई जब कताई मिलों के साथ-साथ यूपी स्टेट हैंडलूम कार्पोरेशन भी बंद हो गया। कार्पोरेशन से बुनकरों को न सिर्फ सस्ते धागे मिलते थे बल्कि उनका उत्पाद भी खरीद लिया जाता था। कार्पोरेशन बंद होने से बुनकर पूरी तरह महाजनों पर निर्भर हो गए।

महाजनों ने घटा दी बुनाई की मजदूरी

महाजन बुनकरों को तौल का धागा देता है और बुनकर बुनाई कर उतने ही वजन का कपड़ा। बदले में मजदूरी मिलती है। 1995 तक बुनकरों को 4 रुपए प्रति मीटर के हिसाब से मजदूरी मिलती थी जो अब घटकर 3.50 रुपये हो गई है।

कोरोना काल ने कर दिया बेहाल

कोरोना काल ने बुनकरों को और बेहाल कर दिया है। बाजार में माल न खपने के चलते महाजनों ने उन्हें काम देना बंद कर दिया। जो लोग नेपाल के लिए बड़े पैमाने पर ढाका टोपी का कपड़ा तैयार करते थे, उनका काम भी ठप हो गया।

सप्ताह में दो दिन भी काम नहीं

35 वर्षों से बुनकरी पेशे से जुड़े दशहरीबाग के इबलुल हसन कहते हैं, ऐसी बदहाली कभी नहीं देखी। 24 घंटे चलने वाला लूम अब सप्ताह में दो दिन भी नहीं चल पा रहा है। रसूलपुर के इमरान दानिश ने 20 में से दस पावरलूम बेचकर सेनेट्री की दुकान खोल ली। बकौल दानिश, अगर हालात नहीं सुधरे तो बचे हुए पावरलूम को औने-पौने दाम में बेचना पड़ेगा। जमुनहिया बाग के परवेज अख्तर ने बताया कि तंगहाली का ऐसा दौर पहली बार आया है।

कच्‍चा माल और बाजार उपलब्‍ध कराने की हो रही कोशिश

हथकरघा एवं वस्‍त्रोद्योग विभाग के सहायक आयुक्‍त रामबड़ाई का कहना है कि कोरोना की वजह से बुनकरों का काम प्रभावित हुआ है। उनके लिए कच्चा माल और बाजार उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है। स्थानीय बुनकरों के उत्पाद से ही जनपद के आठ ब्लाकों के सरकारी स्कूलों के बच्चों के ड्रेस तैयार किए जाएंगे। इसी सप्ताह इस प्रोजेक्ट पर मुहर लग जाएगी।

Edited By: Satish Shukla