गोरखपुर, जेएनएन। गीता प्रेस की पत्र-पत्रिकाओं और किताबों के माध्यम से असंख्य लोगों को देव स्वरूपों की झांकी देखने को मिलती रही है। सौम्य, पवित्र और ऐसी मनोहारी छवियां, जो किसी को भी सहज ही प्रभावित करती हैं। इनमें से बहुत सी तस्वीरों के नीचे जिस चित्रकार के दस्तखत मिलते हैं, वह हैं बीके मित्रा यानी बिनय कुमार मित्रा। रंगों-लाइनों को संजोने में सिद्धहस्त बीके मित्रा की बनाई छवियां उनकी कल्पना और हुनर का प्रमाण हैं। गीता प्रेस के माध्यम से उनकी कला देश-विदेश के बेशुमार लोगों के घरों तक पहुंची और आज भी पहुंच रही है।

धार्मिक ग्रंथों तक पहुंचने की दास्‍तां काफी दिलचस्‍प

घर की दीवारों पर कोयले से चित्र उकेरने वाले बिनय की गीता प्रेस के धार्मिक ग्रंथों तक पहुंचने की दास्तां काफी दिलचस्प है और प्रेरणादायी भी। उनके पिता अक्षय कुमार मित्रा काशी नरेश के निजी सचिव थे। वह बनारस में ही जन्मे और बचपन भी वहीं बीता। पांच भाइयों में सबसे छोटे बिनय का कला के प्रति रुझान बचपन में ही दिखने लगा। बड़े भाई उपेंद्र व तेजेंद्र भी कलाकार थे। ऐसे में उनकी कला को भरपूर प्रोत्साहन मिला और इस वजह से विनय की प्रतिभा और निखरी।

संसाधन का था अभाव

बिनय पर खासकर उपेंद्र का विशेष प्रभाव था, जो धार्मिक चित्र बनाते थे। इस सबके बावजूद संसाधन नहीं थे, ऐसे में बचपन में उन्हें अपनी कला का अभ्यास पड़ोसियों के घरों की दीवारों पर करना पड़ता। रंग और कूंची की जगह उनके हाथ में लकड़ी का कोयला होता। जाहिर है कि कला की इस अभिव्यक्ति के चलते आए दिन उन्हें लोगों की उलाहना सुननी पड़ती थी और नाराजगी झेलनी पड़ती थी पर बिनय को तो धुन सवार थी। कोयले से दीवारों पर उन्होंने न जाने कितने चित्र उकेर डाले।

जब बिनय की कला को मिली पहली बार सामाजिक मान्यता

बिनय की कला प्रतिभा को पहली सामाजिक मान्यता तब मिली, जब दीवारों पर चित्र बनाने को लेकर आए दिन फटकार लगाने वाले एक पड़ोसी ने उन्हें बड़े प्यार से बुलाया और कहा, 'मेरी बेटी की शादी है, चौखट पर केले का पेड़ व भगवान गणेश का चित्र बना दो। उन्होंने खुशी-खुशी बना दिए और इसके एवज में मेहनताना मिला तीन रुपये। उस जमाने के हिसाब से वह रकम बड़ी थी। फिर तो जैसे इस कला के पुजारी को पंख लग गए। पहली आमदनी से उन्होंने कागज, पेंसल व रबर खरीदा। अब उनका हुनर दीवारों की जगह कागज पर उतरने लगा। उसके बाद यह सिलसिला चल पड़ा। बिनय मांगलिक मौकों पर चित्र बनाते और पारिश्रमिक से कला के संसाधन जुटाते। खास बात यह थी कि यह सबकुछ बिना किसी गुरु के चला। कहने की जरूरत नहीं कि उनका हुनर ईश्वर-प्रदत्त था।

प्रभुदत्त ब्रह्मचारी के साथ इलाहाबाद पहुंचे मित्रा

जब इलाहाबाद के झूंसी आश्रम के संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी बनारस आए तो उनकी नजर इस होनहार पर पड़ गई। ब्रह्मचारीजी बिनय से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्हें लेकर झूंसी चले गए और धार्मिक चित्र बनवाने लगे। यह वाक्या 1925 का है।

जब भाईजी से बिनय मित्रा की हुई मुलाकात

जब बीके मित्रा झूंसी आश्रम में धार्मिक चित्र बना रहे थे, उन्हीं दिनों भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार किसी कार्य से झूंसी आश्रम गए तो उनकी मुलाकात बिनय से हो गई। भाईजी गीता प्रेस की 'कल्याण पत्रिका के संपादक थे। उन्हें पत्रिका पर बनने वाले चित्रों के लिए एक चित्रकार की दरकार थी, इसलिए उन्होंने ब्रह्मचारी से बिनय को मांग लिया। सहमति मिलने के बाद भाईजी उन्हें लेकर गोरखपुर आ गए। उसके बाद गीता प्रेस की किताबों से बिनय का नाता ऐसा जुड़ा जो भाईजी के ब्रह्मलीन होने के बाद ही टूटा।

धार्मिक प्रसंग पर बनाए साढ़े चार हजार चित्र

दिग्विजयनाथ एलटी कॉलेज, गोरखपुर की प्रवक्ता (चित्रकला) ममता श्रीवास्तव का कहना है कि गीता प्रेस से चार दशक से अधिक समय से जुड़ाव के दौरान बीके मित्रा ने रामायण व महाभारत के प्रसंगों पर आधारित करीब साढ़े चार हजार चित्र बनाए। गीता प्रेस के लीला भवन में उनके बनाए खूबसूरत चित्रों की श्रृंखला आज भी देखी जा सकती है। उनकी लंबी शिष्य परंपरा भी रही। जगन्नाथ व भगवान जैसे कुछ शिष्यों ने गीता प्रेस में उनकी परंपरा को समृद्ध किया। 

Posted By: Satish Shukla

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