संतकबीर नगर: कबीर की धरती पर बात स्वतंत्रता आंदोलन की हो तो मिश्र बंधुओं का नाम सबसे पहले आता है। जनपद के रक्शा गांव निवासी मिश्र बंधुओं ने तत्कालीन बस्ती जनपद में स्वतंत्रता आंदोलन की कमान संभाली थी।

अंग्रेजी शासन के मुख्य स्तंभ रहे राजा चंगेरा के खिलाफ वर्ष 1930 में पं. लालसा प्रसाद मिश्र, श्यामलाल मिश्र, बंशराज और द्विजेंद्र ने विद्रोह का बिगुल फूंका था। बांसी स्थित उनके महल के सामने विद्रोह को लेकर सभी को कठोर यातनाएं झेलनी पड़ी थी। पं. लालसा प्रसाद मिश्र के बुलावे पर राजा चंगेरा को ठिकाने लगाने के लिए चंद्रशेखर आजाद भी बांसी आए थे। यह सूचना राजा चंगेरा तक पहुंच जाने के कारण वह वापस लौट गए। अंग्रेजी शासन के आंखों की किरकिरी बन जाने से सबसे बड़े भाई लालसा प्रसाद मिश्र को नैनी सेंट्रल जेल भेज दिया गया था। जेल मे बंद रहने के दौरान ही उनके इकलौते पुत्र की मौत हो गई थी। यह कठिन दौर भी उनके इरादे को नहीं डिगा सका। यह है पारिवारिक इतिहास

मेंहदावल ब्लाक के रक्सा निवासी पं पाटेश्वरी प्रसाद मिश्र के छह पुत्र थे। इसमें लालसा प्रसाद मिश्र सबसे बड़े थे। 14 वर्ष की उम्र से ही वह आजादी के आंदोलन से जुड़ गए थे। वर्ष 1941 में गोरखपुर जिले के डोहरिया में ट्रेन लूटने की घटना का नेतृत्व करने के कारण अंग्रेजों ने उन्हें जिदा अथवा मुर्दा पकड़ने का फरमान जारी किया था। वर्ष 1946 में उनके बुलावे पर मेंहदावल आए पंडित जवाहरलाल नेहरु ने क्रांतिकारियों की सभा को संबोधित किया था। 1930 में जेल से छूटने के बाद लालसा प्रसाद मिश्र के साथ उनके भाई श्यामलाल मिश्र और बंशराज भी शामिल हो गए थे। 1932 में उन्हें छह माह की कैद के साथ ही सौ रुपये का जुर्माना लगाकर जेल भेज दिया गया। उनके जेल जाने के बाद छोटे भाई श्यामलाल मिश्र ने कमान संभाल लिया और वह सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हुए। उन पर भी सरकार द्वारा छह माह की कैद और 100 रुपये का जुर्माना लगा दिया गया था। मिश्र बंधुओं का मनोबल तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने वर्ष 1942 में लालसा प्रसाद मिश्र को फिर से एक वर्ष के लिए जेल में बंद कर दिया गया था। इसी दौरान वंशराज मिश्र ने क्षेत्र में भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया जिसके चलते 3 दिसंबर 1942 से जून 1943 तक वे जेल मे बंद रहे। उनके बंद रहने के बाद चौथे भाई द्विजेंद्र मिश्र ने क्षेत्र में व्यक्तिगत सत्याग्रह किया, जिसके चलते उन्हें 25 रुपये जुर्माने के साथ तीन माह की कैद मिली थी। बार-बार जेल और जुर्माने के बाद भी मिश्र बंधुओं के हौसले नहीं टूटे और वे अपने पथ पर आगे बढ़ते ही रहे। अंग्रेजों ने लालसा प्रसाद को 10 अगस्त 1942 से 19 नवंबर 1944 तक नजरबंद रखा था। जब 15 अगस्त को देश आजाद हुआ था तो मिश्र बंधु झूम उठे थे। आजादी मिलने तक तो रक्सा गांव अंग्रेजी शासन के लिए खास सिरदर्द बना हुआ था। आजादी के बाद पं. लालसा प्रसाद मिश्र मेंहदावल के ब्लाक प्रमुख और विधायक भी बने। उनके भतीजे जवाहर लाल मिश्र का कहना है कि आज भी पूरा क्षेत्र और परिवार परिवार व गांव की माटी पर नाज करता है। 15 अगस्त 1972 को भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लालसा प्रसाद मिश्र को दिल्ली बुलाकर आजादी के दौरान किए गए योगदान के लिए ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था। आज भी परिवार उस ताम्रपत्र को परिवार की मर्यादा मानकर सुरक्षित रखे हुए है। दो वर्षों से भूल गए अधिकारी

हर वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को मिश्र बंधुओं के घर पर झंडा फहराने के लिए एक अधिकारी नामित किया जाता रहा। जवाहरलाल मिश्र ने बताया कि दो वर्षों से अब अधिकारी नहीं आते हैं। इसे लेकर परिवार के लोग गांव निवासियों के साथ खुद ही तिरंगा फहराते हैं।

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