कुशीनगर, अजय कुमार शुक्‍ल। पडरौना राजघराने को पूर्वांचल में कांग्रेस के एक मजबूत किले के रूप में देखा जाता रहा है। इसकी वजह रही है क्षेत्र में इस परिवार की क्षेत्र में पकड़ और पार्टी से मजबूत सियासी रिश्ते। 1980 में जब इस राजपरिवार ने कांग्रेस का हाथ पकड़ा तो फिर कभी किसी अन्य दल की ओर नहीं देखा।

लगातार 42 वर्ष तक कांग्रेस से रहा पडरौना राजघराने का अब छूटा साथ

42 वर्षों बाद कुंवर रतनजीत प्रताप नारायण सिंह (आरपीएन सिंह) के भाजपा में शामिल हाेने के साथ ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस का यह मजबूत किला ढह गया। कुछ दिनों से उनके भाजपा में शामिल होने की चर्चा चल रही थी। सोमवार को पडरौना राजदरबार में कांग्रेस के विधानसभा प्रभारियों से बातचीत के दौरान जागरण के कांग्रेस छोड़ने के सवाल पर खुलकर तो नहीं बोले, लेकिन मौन स्वीकृति जरूर दी थी।

अपने दमखम पर आरपीएन पडरौना विधानसभा पर लगा चुके हैं जीत की हैट्रिक

दरअसल, आरपीएन सिंह के भाजपा में शामिल होने के बाद केवल कुशीनगर ही नहीं पूर्वांचल की सियासी बिसात पर ही नए समीकरण खड़े होंगे। इससे भाजपा को बड़ा लाभ मिलने से इन्कार नहीं किया सकता। उनके व्यक्तिगत प्रभाव का अंदाजा इसी बात पाजा सकता है कि जब कांग्रेस की यहां प्रदेश में जमीन खो चुकी थी, बसपा-सपा की लहर चल रही थी, उस समय आरपीएन ने पडरौना विधानसभा सीट से 1996, 2002 और 2007 में जीत की हैट्रिक लगाई।

दून पब्लिक स्कूल ओल्ड ब्वायज सोसायटी के वर्ष 2014 से 2016 तक रहे चुके हैं अध्यक्ष

1996 में ही पडरौना संसदीय सीट पर उनको हार का समाना करना पड़ा। 2009 में यहां से चुनाव जीतकर जब संसद पहुंचे तो यूपी सरकार में सड़क ट्रांसपोर्ट एवं कार्पोरेट, पेट्रोलियम एवं केंद्रीय गृह राज्य मंत्री बने। इसके बाद के लगातार दो चुनावों में उनको हार जरूर मिली, लेकिन पार्टी और क्षेत्र में उनका सियासी कद छोटा नहीं हुआ। कांग्रेस ने राष्ट्रीय प्रवक्ता बना झारखंड प्रदेश के विधानसभा चुनाव की कमान संभाली तो वहां जीत दिलाकर किंग मेकर की भूमिका में उभरे। इस्‍तीफा देने से पहले तक वह झारखंड और छत्‍तीसगढ़ में पार्टी के प्रभारी थे।

राजघराने ने ऐसे रखा सियासत में कदम

पडरौना राजदरबार के कुंवर सीपीएन सिंह 1969 में पडरौना विधानसभा से भारतीय क्रांत‍ि दल से चुनाव मैदान में उतरे और विधायक बने। उस समय जनता ने राजा साहब आए हैं कहकर वोट दिया। इसके बाद इसी दल से जब 1971 में पडरौना संसदीय सीट से चुनाव मैदान में उतरे तो जनता ने साथ नहीं दिया। हार का सामना करना पड़ा। इंदिरा गांधी के कहने पर वह कांग्रेस में शामिल हुए।

पिता कुंवर सीपीएन सिंह पडरौना से दो बार सांसद व केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री रह चुके हैं

1980 में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में संसदीय चुनाव मैदान में उतरे और संसद पहुंचे। इंदिरा गांधी सरकार में केंद्रीय रक्षा राज्यमंत्री बने। 1985 में पुन: कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचो। कांग्रेस से ही 1989 में लाेकसभा चुनाव मैदान में थे। पारिवारिक विवाद में उनके चचेरे भाई ने ही गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। इसके बाद उनके पुत्र कुंवर आरपीएन सिंह ने राजनीति की बागडोर संभाली और कांग्रेस के साथ जुड़े रहे।

राजनीतिक सफर पर एक नजर

25 अप्रैल 1964 को जन्मे आरपीएन सिंह ने दून स्कूल से पढ़ाई की। 1991 में पहली बार पडरौना विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे और भाजपा से हार का सामना करना पड़ा।1996 में कांग्रेस से पडरौना संसदीय सीट से चुनाव लड़े यहां भाजपा प्रत्याशी रामनगीना मिश्र से हारे। इसी वर्ष कांग्रेस-बसपा गठबंधन से पडरौना से विधायक बने। 2002, 2007 में कांग्रेस से इसी सीट से विधायक बने। 2009 में कांग्रेस से सांसद बने। 2014, 2019 में लगातार भाजपा प्रत्याशियों से हार का सामना करना पड़ा।

Edited By: Pradeep Srivastava