गोरखपुर, [रजनीश त्रिपाठी]। प्रवासियों के आने से इन दिनों गांवों की तस्वीर बदली है। पिछली गर्मियों की दुपहरी में सन्नाटे में सिमटे रहने वाले गांवों के बाग-बगीचों और घर की दलानों में इस बार बैठकी जम रही है। घर आने के दौरान झेली गईं दुश्वारियां, कहानियों की शक्ल में बयां हो रही हैं। इन सबके बीच एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा हो जाता है कि रोजी-रोटी और घर की गाड़ी आगे कैसे चलेगी।  इसी फिक्र में जमीन-जायदाद के सवाल भी उठ रहे हैं और बात मारपीट तक पहुुंचने लगी है।

गांवों की पड़ताल के दौरान जो सूरत-ए-हाल नजर आया, उसके मुताबिक मनरेगा उम्मीद तो जरूर बंधाता है। लेकिन कुशल कारीगरों के सामने चुनौती बरकरार है। सतीश कुमार परास्नातक हैं और उनके पास कंप्यूटर डिप्लोमा की डिग्री भी है। वह बेंगलुरू की एक प्राइवेट कंपनी के कम्प्यूटर सेक्शन में कार्यरत थे। लाकडाउन के दौरान बंद हुई कंपनी ने उन्हें प्रवासी बना दिया। नतीजतन वह गोला स्थित अपने गांव हिंगुहार आ गए। क्वारंटाइन सेंटर से मुक्त हुए तो काम की तलाश में जुटे। लेकिन मनोनुकूल काम नहीं मिल पा रहा है। आर्थिक तंगी के चलते जॉब कार्ड बनवा लिया है। अब मनरेगा में मजदूरी करेंगे। रोजी-रोटी की जद्दोजहद में उलझे सतीश कुमार जैसे प्रवासी कमोबेश हर गांव में मिल जाएंगे।

घर आने के दौरान झेली गईं दुश्वारियां कहानियों की शक्ल में हो रही बयां

बांसगांव क्षेत्र के गांव फुलहर निवासी कारपेंटर राजेन्द्र और मशीन पर प्रोडक्शन का काम करने वाले शहाबुद्दीन मध्य प्रदेश से लौटे हैं। खुद को कुशल कारीगर बताने वाले राजेंद्र और शहाबुद्दीन को मलाल है कि उनके लायक काम नहीं मिल पा रहा है। गोला के दोर्महा गांव निवासी अनूप दूबे हिमाचल प्रदेश के बद्दी क्षेत्र में कंप्यूटर की हार्डडिस्क बनाने का काम करते थे। लाकडाउन के चलते गांव आ गए तब से कोई काम नहीं मिला। गोला क्षेत्र में कोई उद्योग या उपक्रम न होने से प्रवासियों को मनरेगा का ही भरोसा है। बड़ी संख्या में प्रवासियों को काम मिल भी गया है। लेकिन जॉब कार्ड बनवाने के लिए परेशान लोगों की संख्या भी कम नहीं है।

फिर बाहर जाना पड़ेगा

सहजनवां के शिवलहिया गांव के प्रवासी मजदूर ओमप्रकाश गुप्ता, मनोज साहनी, बसंतपुर धनहिया के राकेश ,हीरालाल का कहना है कि रोजगार के लिए कुछ और जुगाड़ देखना पड़ेगा। अलगतपुर के रामसेवक विश्वकर्मा, शिवकुमार ने कहा कि यहां काम नहीं है। कोरोना का प्रकोप थमने के बाद बाहर ही जाना पड़ेगा।

बढ़ गए जमीन-जायदाद के विवाद

प्रवासी मजदूरों के घर लौटने के बाद छोटे-छोटे मामले भी बड़े विवाद में बदल जा रहे हैं। हर रोज मारपीट के औसतन तीन-चार मामले सामने आ रहे हैं। हर घर में संख्या बल बढ़ जाने को इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां कहासुनी देखते-देखते मारपीट में बदल गई। सहजनवां के डुमरी नेवास निवासी राम बहादुर राज लॉकडाउन में मुंबई से लौटे तो गांव पर रहने वाले भाई विनोद राज से पुश्तैनी मकान के विवाद में मारपीट हो गई। पुलिस ने दोनों पर कार्रवाई की। पनिका निवासी सोबराती 15 दिन पहले मुंबई से लौटे थे। खेत के बंटवारे को लेकर भाई सुभान के साथ विवाद हुआ, जिसमें दोनों पक्षों में मारपीट भी हुई। घघसरा पुलिस दोनों को लेकर चौकी आई, लेकिन सुलह समझौता कराकर छोड़ दिया गया। गोला के गौरखास गांव में पूर्व माध्यमिक विद्यालय को क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया है। 19 मई को यहां दो पक्षों में पुरानी रंजिश को लेकर मारपीट हुई, जिसमें सात लोग घायल हो गए। दोनों पक्षों ने थाने में मुकदमा पंजीकृत करवाया। 

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