गोरखपुर, जेएनएन। शहर के बीच में स्थित असुरन पोखरे के दायरे में मकान बनाने वाले 100 से अधिक लोगों के सर से संकट फिलहाल समाप्त होने वाला नहीं है। जमीन बेचने वाले परिवार को कब्जा हो चुकी जमीन के बराबर जमीन देनी होगी या फिर सर्किल रेट के अनुसार उतनी जमीन के सर्किल रेट के बराबर रुपये राजस्व में जमा कराने होंगे। आज की दर से करीब 100 करोड़ रुपये चुकाने होंगे। इन्हीं दो स्थितियों में ही मकान को ध्वस्त होने से बचाया जा सकता है। ऐसा न करने पर 29 जनवरी के बाद प्रशासन की ओर से मकानों को खाली कराकर ध्वस्त किया जाएगा।

सदर तहसील प्रशासन की ओर से नोटिस मिलने के बाद कालोनी के लोगों ने जमीन बेचने वाले परिवार के सदस्य के साथ एसडीएम/ज्वाइंट मजिस्ट्रेट सदर से मुलाकात की थी। उन्हें 2010 में दिए गए मंडलायुक्त के आदेश के बारे में बताया गया था। साथ ही जमीन देने पर सहमति भी जतायी थी।

मंडलायुक्त के आदेश के बाद यह हुआ था समझौता

2010 में भी प्रशासन ने पोखरे के जमीन से कब्जा खाली कराने की पहल की थी। उसके बाद कालोनी के लोगों ने जमींदार ऋषभ जैन के साथ मंडलायुक्त से गुहार लगाई थी। मंडलायुक्त के आदेश पर तत्कालीन एडीएम सिटी की उपस्थिति में समझौता हुआ। इसमें तीन बिन्दुओं पर समझौता हुआ था। जलाशय की भूमि पर नक्शा पास करने के लिए जिम्मेदार गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) के अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर 10 दिनों के भीतर कार्रवाई के लिए तत्कालीन उपाध्यक्ष को लिखा गया था। साथ ही नगर आयुक्त को निर्देशित किया गया था कि उस मोहल्ले में विकास कार्य कराने वाले जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाए। तीसरे बिन्दु में जमींदार ऋषभ जैन को पोखरे के लिए जमीन देने या सर्किल रेट के बराबर धनराशि राजस्व में जमा कराने को कहा गया था। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट गौरव सिंह सोगरवाल ने बताया कि 13 मई 2010 को ऋषभ जैन ने शपथ पत्र देकर एक महीने में जमीन देने को कहा था लेकिन अभी तक जमीन नहीं मिली।

मंडलायुक्त को लिखा गया पत्र

ततकालीन मंडलायुक्त के आदेश के परिप्रेक्ष्य में ज्वाइंट मजिस्ट्रेट की ओर से वर्तमान मंडलायुक्त को पत्र लिखकर अवगत कराया गया है कि 10 साल पहले दिए गए आदेश का पालन नहीं किया गया है। इसमें 29 जनवरी तक का समय देने का भी उल्लेख है। साथ ही नक्शा पास करने वाले जीडीए के जिम्मेदारों पर कार्रवाई के लिए जीडीए उपाध्यक्ष को तथा नगर निगम कर्मियों पर कार्रवाई के लिए नगर आयुक्त को निर्देशित करने का अनुरोध किया गया है।

जलाशय की भूमि पर नक्शा पास करने वालों पर नहीं हुई कार्रवाई 

10 दिनों के भीतर जीडीए उन लोगों पर कार्रवाई करनी थी, जिन्होंने जलाशय की भूमि होते हुए भी नक्शा पास कर दिया था। इससे पहले ताल सुमेर सागर के मामले में भी नक्शा पास करने वालों पर कार्रवाई को लिखा गया था लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जमींदार जलाशय की जमीन बेचते रहे, तहसील प्रशासन खारिज-दाखिल करता रहा, जीडीए नक्शा पास करने में नहीं हिचका और नगर निगम ने सड़क नाली बनाने में तेजी दिखायी। ऐसे मामलों में सरकारी विभाग अपने अधिकारियों एवं कर्मचारियों को अभय दान दे देते हैं और जीवन भर की जमा पूंजी खर्च कर मकान बनाने वालों को कार्रवाई का शिकार होना पड़ता है।

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