गोरखपुर : 1989 से लागू अनुसूचित जाति/ जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए बदलाव को रद कर संसद द्वारा नया कानून बनाए जाने के बाद सवर्ण जातियों का भयाकुल होना, अस्वाभाविक नहीं है। इस बात में दो राय नहीं कि अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को सामजिक सुरक्षा देने के लिहाज से यह कानून बड़ा असरकारक रहा, बावजूद इसके बदलते समय के साथ अगर सुप्रीम कोर्ट ने इसमें बदलाव की जरूरत महसूस की, तो फिर विधायिका को हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए था।

यह बात कही, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के प्रोफेसर शफीक अहमद ने, जो सोमवार को दैनिक जागरण कार्यालय में आयोजित पाक्षिक विमर्श की श्रृंखला में 'एससी/एसटी एक्ट का विरोध कितना उचित' विषय पर अपने विचार रख रहे थे। देश में अनुसूचित जाति और जनजातियों की सामाजिक स्थिति पर चर्चा करते हुए प्रो. शफीक ने इस बात को रेखांकित किया कि आरक्षण सहित तमाम व्यवस्थाओं के बाद भी इन जाति समूहों के एक बड़े तबके को अब भी सामाजिक, राजनीति और न्यायिक सुरक्षा दिए जाने की आवश्यकता है। बदलते समय के साथ इनकी स्थिति में हो रहे सुधार की समीक्षा भी किए जाने की आवश्यकता है। प्रो. शफीक ने कहा कि हमारे देश में जब भी कानूनों के दुरुपयोग की बात होती है तब अक्सर जिन दो कानूनों का जिक्र किया जाता है, उनमें से एक दहेज उत्पीड़न है जबकि दूसरा एससी-एसटी एक्ट है। इसका दुरुपयोग होता रहा है और आंकड़े भी देखे जा सकते हैं। ऐसे होने के पीछे वह आंकड़े कारण हैं, जो बताते हैं कि यह कानून एक वर्ग को सुरक्षा देने के लिए बनाए गए थे, लेकिन ज्यादातर मामलों में यह दूसरे वर्ग को प्रताड़ित करने का माध्यम बन रहे हैं। अपने आदेश में न्यायमूर्ति आदर्श गोयल और यूयू ललित ने इस बात को रेखांकित भी किया और शायद इसी के चलते आदेश दिया कि एससी एसटी एक्ट में जो अभियुक्त हैं उनकी तत्काल गिरफ्तारी न हो, और पीड़ित द्वारा शिकायत दायर किए जाने के एक सप्ताह के अंदर पुलिस प्रारंभिक जाच करके ही प्रथम सूचना रिपोर्ट दायर करे, लेकिन सत्ताधारी दल सहित कमोबेश सभी राजनीतिक दल को यह रास नहीं आया। उन्होंने कहा कि हर देश, हर समाज वक्त के अनुभव से सीख कर अपनी व्यवस्था और अपने कानून सुधारता है, उन्हें बेहतर बनाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को ध्यान में रखते हुए अपना निर्णय दिया था।

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राजनीति तय करती है हर आंदोलन की दशा-दिशा : एससी एसटी एक्ट के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को परे हटकर फिर से कानून बनाए जाने को प्रो. शफीक ने चर्चित शाहबानो केस से जोड़ा। उन्होंने कहा कि वह केस वोटबैंक सहेजने की राजनीति के कुत्सित प्रयास का परिचायक था और ताजा प्रकरण को इससे अलग होकर नहीं देखा जा सकता। प्रो. शफीक ने कहा कि सवर्ण युवाओं में जो गुस्सा है उसे अकारण नहीं माना जा सकता। अतीत में हुई सामाजिक गलतियों को सुधारने का यह अर्थ कतई नहीं होता कि जिसने अन्याय किया उसके वंशजों पर अन्याय किया जाए। जाति के नाम पर शोषण और अत्याचार का समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। सामाजिक और आर्थिक उन्नयन हेतु वंचित वर्ग को प्रोत्साहन और संरक्षण मिले यह भी आवश्यक है किंतु किसी भी चीज का अतिरेक बुरा होता है। सामाजिक न्याय का अर्थ सभी के किए समान अवसर और भेदभाव रहित व्यवस्था से है। यह कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि आजादी के बाद आरक्षण सामाजिक तौर पर जरूरी था वहीं अब इसे जारी रखना राजनीतिक मजबूरी बन गई है।

भारत में जातिगत राजनीति मुख्यधारा की मजबूरी : प्रो. शफीक ने कहा कि इस देश की राजनीति का एक कटु सत्य है, जातिगत राजनीति। जो भी अपने जाति समूह के हितों से ऊपर उठकर काम करेगा, वो सार्वजनिक जीवन में हाशिए पर चला जाएगा। हमारे देश का लोकतंत्र एक ऐसे चुनावी तंत्र में तब्दील हो गया है, जिसका ख्याल सभी राजनीतिक दल रखते हैं या रखने को मजबूर हैं। विभिन्न उदाहरणों के साथ प्रो. शफीक ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, उसके बाद दलितों का देशव्यापी आदोलन और फिर दबाव में सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय का आदेश पलटते हुए एक्ट में संशोधन कर उसे मूल रूप में लागू करना। इन सब घटनाक्रमों से समाज में विभाजन की एक गहरी रेखा खींचना तय है, जो किसी भी सूरत में देश-समाज के हित में नहीं होगी। जागरण विमर्श में मौजूद लोगों की ओर से सवाल भी पूछे गए, जिनका जवाब वक्ता ने दिया। इनपुट हेड शैलेंद्र श्रीवास्तव और आउटपुट हेड जितेंद्र त्रिपाठी ने वक्ता का स्वागत किया।

Posted By: Jagran