गोरखपुर, डॉ. राकेश राय। समय तो अल सुबह का था, लेकिन रौनक शाम सी थी। भारत माता की जय, महात्मा गांधी की जय जैसे नारों से अपना गोरखपुर रेलवे स्टेशन गुंजायमान हो रहा था। इन सबके बीच लोगों की निगाहें उस ट्रेन पर टिकी थीं, जिसमें जंगे-आजादी को नई दिशा देने वाली शख्सियत को आना था। ट्रेन दिखी तो लोगों का जोश चरम पर पहुंच गया। ट्रेन रुकी तो इंतजार की घडिय़ां समाप्त हुईं और उसमें से घुटनों तक धोती पहने दुबला-पतला शख्स निकला। वह और कोई नहीं महात्मा गांधी थे, जो जंगे-आजादी में गोरखपुर की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए गोरखपुर पहुंचे थे। दिन था आठ फरवरी 1921 का।

गांधी को सुनने आए थे एक लाख लोग

स्टेशन के बाहर निकलने के बाद उन्होंने लोगों का मान रखा और एक ऊंचे स्थान पर खड़े होकर जनता का अभिवादन स्वीकार किया। सामने एक चादर बिछी थी, जिसपर पैसों की बरसात हो रही थी। उसी दिन उन्हें बाले मियां के मैदान में जनता को संबोधित करना था। दौर खिलाफत आंदोलन का था, सो आजादी के लिए सांप्रदायिक सौहार्द्र कायम करना भी गांधी जी के आगमन का उद्देश्य था। उस समय के दस्तावेज बताते हैं अपने लोकप्रिय नेता को सुनने के लिए मैदान में एक लाख से अधिक लोगों का जनसमूह था। यह उन दिनों की बात है कि जब महानगर की आबादी महज 58 हजार थी। यातायात के सीमित संसाधनों के दौर में जनसमूह का आंकड़ा इतिहास कायम करने वाला था। गांधी जी के करीब एक घंटे के ओजपूर्ण भाषण ने लोगों में जंगे-आजादी के लिए आश्चर्यजनक रूप से ऊर्जा भर दी। गोरखपुर में आजादी के परवानों की लंबी फौज तैयार हो गई। बहुत से लोग तो सरकारी नौकरी छोड़ आंदोलन का हिस्सा बन गए। शहर से लेकर गांव तक चरखा चलाने वालों की बाढ़ सी आ गई।

ऐसे बनी गांधी के आगमन की भूमिका

अक्टूबर 1920 को मौलवी मकसूद अहमद फैजाबादी और गौरीशंकर मिश्रा की अध्यक्षता में हुई सार्वजनिक सभा में गांधी को गोरखपुर बुलाने का निर्णय हुआ। उन्हें बुलावा भेजा गया। उधर बाबा राघवदास की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल ने कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में उनसे मिलकर आने की अपील की।

बिहार से आए थे गांधी

मौलाना शौकत अली के साथ महात्मा गांधी बिहार से यहां आए। उस समय गोरखपुर की पूर्वी सीमा भटनी तक लगती थी। गोरखपुर से कांग्रेसियों का एक प्रतिनिधिमंडल अपनी नेताओं की अगवानी के लिए भटनी गया था। देवरिया में उनके दर्शन के लिए हजारों लोग मौजूद थे।

नौकरी छोड़ स्वतंत्रता सेनानी बने प्रेमचंद व फिराक

आठ फरवरी 1921 को बाले मियां के मैदान से महात्मा गांधी का भाषण सुनने वालों में मुंशी प्रेमचंद और फिराक गोरखपुर जैसी शख्सियतें भी मौजूद थीं। गांधी का भाषण सुन दोनों ही इतने मुरीद हुए कि अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्रता सेनानी बन गए।

गांधी से मिल गया होटल को नाम

बक्शीपुर के पास एक होटल है गांधी मुस्लिम होटल। इस होटल के नाम के पीछे भी गांधी जी के गोरखपुर आगमन से जुड़ा किस्सा है। उन दिनों यह होटल न होकर टी-स्टाल था, जहां आजादी के परवानों का जमघट लगा करता था। इसे पहले गांधी टी-स्टाल और बाद में गांधी मुस्लिम होटल नाम तब मिल गया जब बाले मियां मैदान तक जाने के दौरान गांधी वहां कुछ देर ठहरे।

Posted By: Pradeep Srivastava

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