गोरखपुर। पूर्वांचल की धरती पर अंग्रेजों के खिलाफ प्रत्यक्ष तौर पर मोर्चा खोलने वाले रणबाकुरे तो थे ही, कलम की ताकत से उनकी रात की नींद और दिन का चैन छीन लेने वालों की कमी भी नहीं थी। पं. दशरथ प्रसाद द्विवेदी ऐसे ही कलमकार थे, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अपनी कलम से 'स्वदेश' जैसा पत्र निकालकर पूर्वांचल के लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाई। प्रेस एक्ट की चुनौतियों के बीच कलम की ताकत से राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभायी। आजादी का अमृत महोत्सव वह अवसर है, जब हम स्वाधीनता आंदोलन में उनके योगदान को याद कर, अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें।

क्या कहते हैं द्विवेदी जी पर शोध करने वाले प्रोफेसर

दशरथ द्विवेदी में राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत मानस के निर्माण में उत्तर भारत के तत्कालीन महत्वपूर्ण पत्र 'प्रताप' और उनके गुरु गणेश शंकर विद्यार्थी का विशेष योगदान है। 'प्रताप' और विद्यार्थी जी जरिये ही उन्होंने पत्रकारिता का ककहरा सीखा। द्विवेदी जी पर शोध करने वाले गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के आचार्य प्रो. प्रत्यूष दुबे बताते हैं कि विद्यार्थी जी की जेल यात्रा के दौरान 'प्रताप' के कुछ अंकों का संपादन द्विवेदी जी ने ही किया। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर ही विद्यार्थी जी ने उन्हें गोरखपुर से एक पत्र निकालने की सलाह दी, जिसके परिणाम स्वरूप छह अप्रैल 1919 को 'स्वदेश' का संपादन शुरू हो सका।

वह वही दौर था, जब रोलट एक्ट के विरोध को लेकर हुए देशव्यापी आंदोलन के दौरान जलियांवाला बाग की घटना हुई। 'स्वदेश' ने अपने ध्येय वाक्य 'जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं' से ही अपने उद्देश्य को स्पष्ट कर दिया था। इन पंक्तियों से यह साफ था कि 'स्वदेश' का उद्देश्य स्वराज पाना था। जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद 'स्वदेश' ने आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया तो पंजाब में इसके प्रवेश पर रोक लगा दी गई।

विजयांक के बाद आक्रामक हो गई अंग्रेजी सरकार

सात अक्टूबर 1924 में विजयादशमी के दिन 'स्वदेश' का विजयांक निकाला गया तो अंग्रेजी सरकार आक्रामक हो गई। विजयांक की सामग्री को आपत्तिजनक मानते हुए सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया और उस अंक को जब्त कर लिया गया। चूंकि वह किताब कथाकार प्रेमचन्द के सरस्वती प्रेस में छपी थी, सो 'स्वदेश' के संचालक दशरथ प्रसाद द्विवेदी के साथ-साथ प्रकाशक व प्रेमचन्द के भाई महताब राय भी गिरफ्तार कर लिये गए। इस घटना के चलते 'स्वदेश' का अंक प्रभावित जरूर हुआ लेकिन कुछ-कुछ अंतराल के बाद 1938 तक निकलता रहा और स्वाधीन चेतना के निर्माण में अविस्मरणीय भूमिका निभाता रहा। पं. द्विवेदी ने 1942 में एक बार फिर इसका प्रकाशन शुरू करने की योजना बनाई लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के चलते उन्हें जेल जाना पड़ गया और योजना कार्यरूप नहीं ले सकी।

Edited By: Pragati Chand