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कैसे बनती है वैक्सीन...वायरस कैसे पहचानते हैं? जवाब तलाशने ICMR की लैब पहुंचे 50 हजार छात्र

Published: Wed, 12 Aug 2026 12:52 PM (IST)Updated: Wed, 12 Aug 2026 02:12 PM (IST)

आइसीएमआर ने 'साइन' कार्यक्रम के तहत कक्षा 9 से 12 तक के 50 हजार बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि ...और पढ़ें

मेडिकल कॉलेज में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ रिसर्च में बच्चों को समझाते डॉ अशोक पांडेय। जागरण

मेडिकल कॉलेज में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ रिसर्च में बच्चों को समझाते डॉ अशोक पांडेय। जागरण

HighLights

  1. आइसीएमआर का 'साइन' कार्यक्रम 50 हजार बच्चों के लिए।

  2. गोरखपुर में 1000 छात्रों ने अत्याधुनिक प्रयोगशाला का भ्रमण किया।

  3. छात्रों को वायरस पहचान, जीनोम सिक्वेंसिंग की जानकारी दी गई।

जागरण संवाददाता, गोरखपुर। किताबों में पढ़ा वायरस प्रयोगशाला में कैसा दिखता है? किसी अनजान बीमारी के कारक बैक्टीरिया या वायरस की पहचान कैसे होती है? वैक्सीन बनती कैसे है और किसी बीमारी की जांच के लिए किट या उपकरण किस तरह तैयार किए जाते हैं?

अब इन सवालों के जवाब बच्चों को किताबों से नहीं, बल्कि अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में मिल रहे हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने कक्षा नौ से 12 तक के विद्यार्थियों में विज्ञान के प्रति जिज्ञासा और शोध की रुचि पैदा करने के लिए देशव्यापी पहल ''साइन'' शुरू की है।

इस अभियान के अंतर्गत आइसीएमआर की 28 शाखाएं, 15 फील्ड स्टेशन और 38 माडल रूरल हेल्थ रिसर्च यूनिट मिलकर देशभर के 50 हजार बच्चों को प्रयोगशालाओं का भ्रमण कराएंगी। अभियान मंगलवार को शुरू हो गया। विद्यार्थियों को मेडिकल रिसर्च की बारीकियां समझाने के साथ उन्हें इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए भी प्रेरित किया जाएगा। गोरखपुर स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ रिसर्च (एनआएचआर) को दो हजार विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी मिली है।

मंगलवार को पहले चरण में एक हजार विद्यार्थियों को प्रयोगशाला का भ्रमण कराया गया। केंद्रीय विद्यालय और जनता इंटर कालेज के विद्यार्थियों ने विज्ञानियों से बीमारी की जांच और शोध की प्रक्रिया को करीब से समझा। वायरोलाजिस्ट डा. अशोक पांडेय ने विद्यार्थियों को वायरस की जीनोम सिक्वेंसिंग की प्रक्रिया समझाई और मशीन का प्रदर्शन किया।

उन्होंने बताया कि जब किसी क्षेत्र में कोई बीमारी फैलती है और उसके कारक वायरस या बैक्टीरिया की जानकारी नहीं होती, तब पैथोजन की पहचान के लिए जीनोम सिक्वेंसिंग की मदद ली जाती है। जीनोम सिक्वेंसर से जुड़े सर्वर में दुनिया के विभिन्न पैथोजन का डाटा मौजूद है।

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सीरम का नमूना डालने पर उसकी आनुवंशिक संरचना उपलब्ध डाटा से मिलाई जाती है और सबसे समान पैथोजन की पहचान की जाती है और उसी के अनुसार उसकी रोकथाम के उपाय किए जाते हैं। कार्तिक पांडेय ने विद्यार्थियों को माइक्रोस्कोप के माध्यम से जीवित और मृत सेल की पहचान करने की प्रक्रिया बताई।

बच्चों को रक्त कैंसर की मानक जांच साइटोफ्लोमेट्री, रैपिड जांच किट व उपकरण बनाने की प्रक्रिया तथा आरएनए-डीएनए और होल पैथोजन की जांच के बारे में भी जानकारी दी गई। विद्यार्थियों को मोबाइल बायोसेफ्टी लेवल-3 लैब, वायरस रिसर्च डायग्नोस्टिक लैब, वैक्सीन एंड इम्यूनोलाजी लैब और मोबाइल टीबी जांच लैब भी दिखाई गई। विज्ञानियों ने



आइसीएमआर बच्चों को केवल प्रयोगशाला दिखाकर नहीं रुकेगा। 12 अगस्त से विद्यार्थी आइसीएमआर के पोर्टल पर अपने नवाचार साझा कर सकेंगे। इनमें उपयोगी और महत्वपूर्ण नवाचारों का चयन किया जाएगा। नवंबर में 100 विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया जाएगा। वहीं जिन विद्यार्थियों के नवाचार मेडिकल रिसर्च के लिहाज से महत्वपूर्ण पाए जाएंगे, उन्हें आइसीएमआर की ओर से फंडिंग भी दी जाएगी। इस पहल का उद्देश्य बच्चों में विज्ञान को केवल विषय नहीं, बल्कि शोध और समाधान का माध्यम बनाने की सोच विकसित करना है।

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-डा. हरिशंकर जोशी, निदेशक एनआएचआर