गोरखपुर : वैसे तो मोहर्रम पूरे मुल्क ही नहीं बल्कि विश्व भर में मनाया जाता है। मगर सिद्धार्थनगर जिले में हल्लौर का मोहर्रम उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखता है। मोहर्रम का चांद होने के बाद सवा दो महीने अय्याम-ए-अ•ा शोक के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान करीब दस हजार की आबादी वाले इस कस्बे में सिर्फ गम का माहौल ही छाया रहता है। पुराना इतिहास है मोहर्रम का

हल्लौर के मोहर्रम का इतिहास बेहद पुराना है। हल्लौर को आबाद करने वाले शाह अब्दुल रसूल सूफी विद्वान थे, जो ईरान से ¨हदुस्तान आए थे। आज का सैय्यद वंश उन्हीं की नस्ल से है। इमाम हुसैन व उनके साथियों की शहादत पर खेराजे अकीदत पेश करने के लिए कस्बे में जगह-जगह ताजिया रखने के लिए चौक बने हुए हैं। मोहर्रम के लिए ताजिया का निर्माण यहां पूरे वर्ष चलता। क्योंकि यहा से दूर दराज के लोग ताजिया ले जाकर अपनी मनौती पूरी करते है। बकरीद से पहले ही बनाना शुरू हो जाता है ताजिया

यहां का ऐतिहासिक बीस फिट का बड़ा ता•ायिा बकरीद पर्व से पहले ही बनना शुरू हो जाता है। कस्बे में एक दर्जन से अधिक सार्वजनिक इमाम बाड़े हैं, इसमें चांद रात से ही मजलिस का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है जो पूरे सवा दो महीने तक चलता है। सात मोहर्रम को प्रात: हल्लौर की दो प्रसिद्ध अंजुमनें क्रमश: अंजुमन गुलदस्ता मातम व अंजुमन फरोग मातम के बैनर तले निकलने वाला जुलूस पूरे कस्बे में दिन भर गश्त करता है। रात में इमाम हसन के बेटे हजरत कासिम की याद में मेंहदी का जुलूस बरामद होता है। आठ मोहर्रम को दरगाह हजरत अब्बास से अलम के साथ मातमी जुलूस निकलता है। जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से अकीदतमंद आते हैं इसमें ¨हदू समुदाय के लोगों की तादाद भी अधिक रहती है। कई स्थानों पर जंजीर, कमां व तलवार का मातम भी होता है। इस मातम को देखने वाले दांत तले उंगली भले ही दबा लेते हों मगर मातमदारों के जोश में जरा भी कमी नहीं आती है। इसी रात इमाम हुसैन के अट्ठारह साल के बेटे अली अकबर की याद में ताबूत का जुलूस निकलता है। नौ मोहर्रम की रात होते ही सभी घरों पर छोटे-बड़े ताजिये रखे जाते हैं। यहां आग पर करते हैं मातम

हल्लौर में इमाम बाड़े की चौक पर रखा जाने वाला ताजिया पूरे क्षेत्र के श्रद्धालुओं लिए आकर्षक का केंद्र रहता है। सुबह की अजान के बाद आग पर मातम होता है, जलते हुए अंगारों पर मातमदार नंगे पैर या हुसैन-या हुसैन की सदाओं के बीच मातम करते हैं। इसके उपरांत अलम, जुलजनाह की शबीह के साथ जुलूस बरामद होता है जो कस्बे में गश्त करता है। शाम को लोग अपने-अपने ताजियों को कस्बे के पश्चिम स्थित करबला ले जाते हैं और उसको दफ्न कर देते हैं। शाम को शामें गरीबां का प्रोग्राम होता है। चालीस दिन बाद इमाम का चेहलुम मनाया जाता है जिसमें अमारी की शबीह निकाली जाती है। मजलिसों में आते हैं देश के मशहूर धार्मिक उलेमा

मोहर्रम के दौरान हल्लौर कस्बे में ऐसी मजलिसों का भी आयोजन भी होता है जिसको खिताब करने मुल्क के मशहूर जाकिर व धार्मिक उलेमा आते हैं। सवा दो महीने के आखिरी दिन यानी आठ रबीअव्वल को अय्यामे अ•ा का अंतिम दिन मनाया जाता है। जिसमें अमारी, जुलजनाह की शबीह के साथ मातमी जुलूस निकाला जाता है। सवा दो माह तक नहीं होता कोई शुभ कार्य

करीब दस हजार की आबादी वाले हल्लौर कस्बे में इस तारीख के बाद ही शादी विवाह आदि शुभ कार्यक्रम शुरू होते हैं। क्योंकि पूरे सवा दो महीने तक यहां किसी प्रकार शादी-विवाह अथवा किसी प्रकार के खुशी वाले कोई भी कार्यक्रम नहीं होते हैं। सिर्फ मातम रहता है।

Posted By: Jagran