रजनीश त्रिपाठी, गोरखपुर : बाढ़ से क्षतिग्रस्त फसल के मुआवजा वितरण में राजस्वकर्मियों की कारस्तानी ने किसानों को परेशानी में डाल दिया है। ब्रह्मापुर के सरार गांव में मनमानी का आलम ये है कि उस परिवार को एक रुपये भी मुआवजा नहीं मिला है, जिसकी फसल बाढ़ में डूबकर बर्बाद हो गई है जबकि जिसके पास खेत ही नहीं है उसके खाते में मुआवजे की धनराशि पहुंच गई है। इतना ही नहीं कई ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जिसमें बराबर खेत और नुकसान उठाने वाले किसानों के लिए मुआवजे की धनराशि अलग-अलग तय कर दी गई है। बड़े पैमाने पर इस गड़बड़ी की शिकायत अधिकारियों तक पहुंची है।

वर्ष 2017 में आई भीषण बाढ़ के दौरान जनपद की कई तहसीलों में फसलों को भारी नुकसान हुआ था। इसके लिए प्रदेश सरकार ने केंद्र से राहत राशि की मांग की थी। केंद्र सरकार ने फसल क्षतिपूर्ति के लिए धनराशि आवंटित की तो आपदा विभाग ने सभी तहसीलों से नुकसान के संबंध में रिपोर्ट तलब की। फसल क्षतिपूर्ति की धनराशि के वितरण में गड़बड़ी न हो इसके लिए ई-पेमेंट से खातों में मुआवजे की रकम भेजने का प्रावधान किया गया। तहसीलों से आई रिपोर्ट को आपदा विभाग ने शासन को भेजा था, जिसके बाद बाढ़ से क्षतिग्रस्त कृषि फसलों के सापेक्ष कृषि निवेश अनुदान वितरित करने के लिए राज्य आपदा मोचन निधि से गोरखपुर समेत प्रदेश के 18 जनपदों को करीब 150 करोड़ रुपये का बजट जारी किया गया।

चहेतों से घर बैठे लगवा दी रिपोर्ट

मुआवजा वितरण में असमानता और मनमानी से आहत गांव वालों का आरोप है कि लेखपाल ने क्षतिपूर्ति के संबंध में कोई सर्वे नहीं किया। गांव के ही उनके कुछ चहेतों ने मनमाने ढंग से घर बैठे ही सर्वे कर लिया और जो मर्जी आई रिपोर्ट तैयार कर दी। इसी का नतीजा है कि जिसको मुआवजा मिलना चाहिए था उसे नहीं मिला। कमिश्नर से मिलकर की थी शिकायत

फसल क्षतिपूर्ति के मुआवजा वितरण में असमानता की शिकायत गांव के लोगों ने कमिश्नर अनिल कुमार से की थी। धांधली के गंभीर आरोप लगाए थे, जिस पर कमिश्नर ने जांच कराकर आवश्यक कार्रवाई का भरोसा दिलाया था।

कराएंगे जांच, मिलेगा बराबर मुआवजा

जिलाधिकारी के. विजयेंद्र पाण्डियन ने बताया कि मुआवजा वितरण के लिए सर्वे कराया गया था। खसरा के आधार पर मुआवजा की राशि तय होती है। इसमें अगर चूक हुई है तो इसे सुधार कराकर समान और नियम संवत ढंग से मुआवजा वितरित कराया जाएगा। संबंधित प्रकरण की जांच भी कराई जाएगी।

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केस स्टडी

केस-एक : गणेश धर दुबे के चार बेटों के खेत का कुल रकबा 10.52 एकड़ है। सभी के हिस्से में 2.63 एकड़ खेत है। राजस्व कर्मचारियों ने जब मुआवजे का निर्धारण किया तो सर्वजीत के हिस्से में 17200, रामकृपाल के हिस्से में 7800, केदारनाथ के हिस्से में 4800 जबकि प्रद्युम्मन के हिस्से में एक रुपये का भी मुआवजा नहीं आया। केस-दो : रवींद्र धर दुबे, ओंकार नाथ, ऋषि देव, बौद्ध नारायण और गजानन अलग-अलग परिवारों के हैं, लेकिन खेत का रकबा कमोबेश सबका बराबर है। रविंद्र को 6200 तो ओंकार नाथ को 10800 रुपये मुआवजा मिला। सगे भाई बौद्ध नारायण और गजानन को 7000-7000 रुपये मुआवजा दिया गया। ऋषि देव को एक रुपये भी मुआवजा नहीं मिला। इसी तरह मालवीय धर के दो बेटों त्रिलोकी और बनारसी को तो 10330-10330 रुपये मिले, लेकिन तीसरे बेटे हरिहर धर दुबे को महज 6100 रुपये मिले। केस-तीन : इसी गांव का एक अन्य व्यक्ति हैं, जिसमें उनकी पत्‍‌नी और सात बच्चों के नाम से अलग-अलग खेत हैं। सभी का हिस्सा मिला भी लें तो दस एकड़ खेत भी नहीं है। बावजूद इसके पूरे परिवार को मिलाकर 164160 रुपये मुआवजा दिया गया है। मुआवजे की रकम से तुलना करें तो इस परिवार के पास लगभग 30 एकड़ से अधिक खेत निकल रहा है, जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है।

By Jagran