मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

गोरखपुर, जेएनएन। विश्वविद्यालय की जो कार्यपरिषद, शिक्षक पदों पर नियुक्तियों को स्वीकृति देती है, उसके सदस्यों को ही चयनित हो रहे अभ्यर्थियों का बायोडाटा देखने को नहीं मिलता। यह निजाम है दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय का। बीते दिनों संपन्न शिक्षक चयन प्रक्रिया में ऐसा ही हुआ, जहां चयन समिति की संस्तुतियां होते समय जब कार्यपरिषद सदस्य प्रो.राम अचल सिंह ने नियुक्त हो रहे अभ्यर्थियों का बायोडाटा, साक्षात्कार के प्राप्तांक आदि बाबत जानकारी मांगी तो दो टूक शब्दों में 'नियम नहीं है', का जवाब दे दिया गया। प्रो. सिंह ने इस पर हैरानी जताते हुए इस व्यवस्था को शुचिता के लिहाज उचित नहीं होने की बात कही। प्रो. सिंह का कहना था कि यह कैसी व्यवस्था है जहां, नियुक्ति की स्वीकृति देना तो हमारी जिम्मेदारी है, लेकिन उस बारे में जानकारी मांगना उचित नहीं। हालांकि अध्यक्षता कर रहे कुलपति कुछ सुनने को तैयार न थे और अंतत: चयन समिति की संस्तुतियां प्रस्तुत कर दी गईं।

वहीं अब विश्वविद्यालय ने अभ्यर्थियों को भी उनसे जुड़ा ब्योरा देने से मना कर दिया है। विश्वविद्यालय न तो चयन का मापदंड ही बताएगा न ही सफल अभ्यर्थियों का एकेडमिक रिकॉर्ड। किस अभ्यर्थी को इंटरव्यू में कितने अंक मिले, यह जानकारी भी नहीं मिलेगी,यही नहीं अभ्यर्थी अगर खुद को मिले नंबर भी जानना चाहे तो भी उसे जानकारी नहीं दी जाएगी।

सूचना का अधिकार (आरटीआइ) के तहत प्राप्त तमाम अर्जियों को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया है कि 'कुलपति जी के निर्देशानुसार मूल्यांकन आख्या से जुड़ी जानकारी सूचना के अधिकार अंतर्गत नहीं दी जा सकती'। शिक्षक भर्ती पर भ्रष्टाचार के आरोपों से गर्माए माहौल के बीच अब आरक्षित संवर्ग के युवाओं की ओर से प्रकरण की शिकायत केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री से भी की गई है। वहीं कार्यपरिषद के वरिष्ठ सदस्य और नगर विधायक की शिकायतों के बाद कुलाधिपति स्तर से जांच के आदेश दिए जाने के आसार बन रहे हैं।

शुरू से ही दबाए जाते रहे विरोध के स्वर

दो चरणों में पूरी हुई शिक्षक चयन प्रक्रिया के दौरान जब कहीं भी विरोध के स्वर उभरे, विश्वविद्यालय प्रशासन ने या तो उसे अनसुना कर दिया अथवा दबाने का प्रयास किया। चयन संबंधी लिफाफा खोले जाने बाबत बीते वर्ष 29 अप्रैल को हुई कार्यपरिषद की बैठक में सदस्य प्रो.अजेय कुमार गुप्त ने अलग-अलग मामलों में आपत्तियां जताई थीं, लेकिन बैठक में 15-20 मिनट देरी से आने की बात कहते हुए उनकी किसी भी आपत्ति का संज्ञान नहीं लिया गया। प्रो.गुप्त ने सदस्यों को नियमों की प्रतियां उपलब्ध कराते हुए कुलपति से यूजीसी के मानकों के अनुरूप चयनित अभ्यर्थियों को मिले अंकों की जानकारी मांगी। लेकिन उनकी एक न सुनी गई। 02 जुलाई 2018 को हुई अगली बैठक में वह समय से पहुंचे और फिर पहले की बातें दोहराईं लेकिन एक न सुनी गई। चयन परिणाम सार्वजनिक कर दिया गया।

इसी तरह हिंदी और बायोटेक्नालॉजी विभाग के लिए इस वर्ष जुलाई में हुई कार्यपरिषद बैठक में प्रो.राम अचल सिंह ने नियमों की अवहेलना होने, चयनित अभ्यर्थियों का बायोडाटा उपलब्ध कराने जैसी बातें कहीं, लेकिन उनकी बात को भी अनसुना कर दिया गया। अवध विश्वविद्यालय के कुलपति और उच्चतर सेवा शिक्षा परिषद के चेयरमैन जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे प्रो.सिंह, इस व्यवहार से क्षुब्ध होकर अपनी आपत्ति जताते हुए बैठक छोड़कर चले गए। विवि की मनमानी का आलम इतना रहा कि बतौर सदस्य प्रो.सिंह की आपत्ति को बैठक की कार्यवृत्ति में दर्ज तक नहीं किया गया। मजबूरन, आठ अगस्त को उन्होंने कुलसचिव को चेतावनी भरा पत्र लिखा, जिसके बाद उनकी आपत्ति को बैठक की कार्यवृत्ति में समाहित किया जा सका।

पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप ही हुई है। कहीं किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं है। देश के विभिन्न क्षेत्रों से योग्य अभ्यर्थियों का चयन शिक्षक के रूप में हुआ है। भ्रष्टाचार अथवा अनियमितताओं के आरोप निरर्थक हैं। - प्रो. विजय कृष्ण सिंह, कुलपति, गोरखपुर विश्वविद्यालय

मैं जिसकी नियुक्ति को स्वीकृति दे रहा हूं, उसके शैक्षणिक एवं शोध कार्य अथवा साक्षात्कार में उसके प्रदर्शन के बारे में जानकारी क्यों नहीं ले सकता? अगर ऐसा है तो फिर बैठक कराने की जरूरत ही क्या है? - प्रो. राम अचल सिंह, कार्यपरिषद सदस्य, गोरखपुर विश्वविद्यालय।

Posted By: Pradeep Srivastava

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप