गोरखपुर सबरंग: मैदान से चमकते पूर्वांचल के सितारे, संघर्ष से लिखी सफलता की गाथा
पूर्वांचल के खिलाड़ियों ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी प्रतिभा और मेहनत से खेल जगत में पहचान बनाई है। आदित्या ...और पढ़ें
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वीर बहादुर सिंह स्पोर्टस कालेज में हाकी ग्राउंड पर खेलती महिला खिलाड़ी। फाइल फोटो
HighLights
सीमित संसाधनों के बावजूद पूर्वांचल के खिलाड़ियों ने बनाई पहचान।
आदित्या यादव, आलोक निषाद जैसे युवा सितारों ने किया नाम रोशन।
खेल प्रशासन में भी गोरखपुर के दिग्गजों का महत्वपूर्ण योगदान।
प्रभात कुमार पाठक, गोरखपुर। मैदान चाहे छोटा हो, लेकिन सपनों की उड़ान कभी छोटी नहीं होती। पूर्वांचल की मिट्टी ने ऐसे कई खिलाड़ियों को जन्म दिया है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बीच अपनी प्रतिभा, अनुशासन और अथक मेहनत के दम पर खेल की दुनिया में अलग पहचान बनाई। गांव-कस्बों और साधारण परिवारों से निकले इन खिलाड़ियों ने साबित किया है कि सुविधाओं का अभाव सफलता की राह रोक नहीं सकता, यदि हौसला बुलंइ हो।
किसी ने बचपन में रैकेट थामकर अपनी पहचान बनाई, किसी ने टेनिस बाल से क्रिकेट का सफर शुरू किया तो किसी ने फुटबाल के मैदान को अपने सपनों का ठिकाना बनाया। इनके लिए हर अभ्यास एक नई चुनौती और हर प्रतियोगिता खुद को साबित करने का अवसर रही। यही निरंतरता उन्हें स्थानीय मैदानों से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले गई।
यहां के कुछ खिलाड़ियों ने मैदान पर अर्जित अनुभव को आगे चलकर खेल प्रशासन की जिम्मेदारियों में बदला। यही बदलती तस्वीर पूर्वांचल को खेल प्रतिभाओं की नई जमीन बना रही है। राष्ट्रीय खेल दिवस पर खिलाड़ियों के संघर्ष से लेकर लक्ष्य के सफर पर प्रस्तुत है वरिष्ठ संवाददाता प्रभात कुमार पाठक की विशेष रिपोर्ट...
खेल का मैदान अक्सर बराबरी का मैदान कहा जाता है, लेकिन वहां तक पहुंचने की राह हर खिलाड़ी के लिए बराबर नहीं होती। किसी के सामने आर्थिक सीमाएं होती हैं तो किसी को शारीरिक चुनौती से पार पाना होता है। किसी को परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अभ्यास का समय निकालना पड़ता है तो किसी को अपनी पहचान बनाने के लिए लगातार खुद को साबित करना पड़ता है। पूर्वांचल के उभरते खिलाड़ियों की कहानियां इसी संघर्ष की अलग-अलग तस्वीरें पेश करती हैं।
इन खिलाड़ियों की सबसे बड़ी पूंजी उनकी प्रतिभा के साथ सीखने और टिके रहने की क्षमता रही। छोटी उम्र में मिली सफलता ने जहां आत्मविश्वास बढ़ाया, वहीं असफलताओं और कठिन परिस्थितियों ने उन्हें अधिक अनुशासित बनाया। नतीजा यह रहा कि स्थानीय मैदानों से शुरू हुआ सफर राष्ट्रीय चयन, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और देश की प्रतिष्ठित लीग तक पहुंचा।
इन उपलब्धियों का असर सिर्फ खिलाड़ियों तक सीमित नहीं है। जब किसी छोटे शहर का खिलाड़ी देश की जर्सी पहनता है या किसी साधारण परिवार का युवा बड़े मंच पर अपनी जगह बनाता है तो उसके पीछे उसी क्षेत्र के सैकड़ों बच्चों को एक नया विश्वास मिलता है। उन्हें लगता है कि सपना देखना ही नहीं, उसे हासिल करना भी संभव है।
पूर्वांचल की यह नई खेल तस्वीर इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यहां सफलता की कहानियों के साथ नेतृत्व की कहानियां भी जुड़ रही हैं। मैदान पर पसीना बहाने वाले कुछ खिलाड़ी आगे चलकर खेल व्यवस्था का हिस्सा बने और अपने अनुभव को प्रशासनिक जिम्मेदारियों में इस्तेमाल किया। इस तरह खेल यहां सिर्फ करिअर नहीं, बल्कि व्यक्तित्व और नेतृत्व गढ़ने का माध्यम भी बन रहा है।

रैकेट की खामोशी को आदित्या ने बनाई आवाज
उम्र छोटी, हौसला बड़ा और उपलब्धियों की उड़ान अंतरराष्ट्रीय मंच तक। गोरखपुर के बिछिया जंगल तुलसीराम की आदित्या यादव की कहानी उन खिलाड़ियों के लिए मिसाल है, जो परिस्थितियों को अपनी पहचान बनने नहीं देते। मूक-बधिर होने के बावजूद आदित्या ने बैडमिंटन कोर्ट पर अपनी अलग पहचान बनाई। महज पांच वर्ष की उम्र में रैकेट थामने वाली आदित्या ने बहुत जल्द अपने से अधिक उम्र के खिलाड़ियों को चुनौती देना शुरू कर दिया। लगातार बेहतर प्रदर्शन ने उन्हें कम उम्र में ही ‘गोल्डन गर्ल’ की पहचान दिलाई। उनकी प्रतिभा को सबसे पहले पिता दिग्विजयनाथ यादव ने पहचाना।
रेलवे में बैडमिंटन कोच पिता ने बेटी के खेल को दिशा देने की जिम्मेदारी खुद संभाली। अभ्यास, प्रतियोगिताओं और निरंतर मेहनत का यह सिलसिला धीरे-धीरे बड़ी उपलब्धियों में बदलता गया। नई दिल्ली में हुए राष्ट्रीय चयन ट्रायल में शानदार प्रदर्शन के बाद आदित्या का चयन ब्राजील में होने वाले मूक-बधिर ओलिंपिक के लिए हुआ। इस उपलब्धि ने उन्हें भारत की सबसे कम उम्र की खिलाड़ियों में विशेष स्थान दिलाया। एक प्रतियोगिता के दौरान स्टार शटलर पीवी सिंधू ने भी उनके खेल की सराहना की और उपयोगी सुझाव दिए।
आदित्या की कहानी की खास बात यह है कि उन्होंने आवाज के अभाव को कभी अपनी राह की सीमा नहीं बनने दिया। कोर्ट पर उनका रैकेट ही उनकी आवाज बना और प्रदर्शन उनकी पहचान। वर्ष 2022 में ही ब्राजील में आयोजित डेफ वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी भारत को पांच पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाली आदित्या गत 22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुकी हैं।

अब सीनियर टीम पर आलोक की नजर
गोरखपुर के फुटबाल खिलाड़ी आलोक निषाद के लिए मैदान सिर्फ खेल की जगह नहीं, सपनों की प्रयोगशाला है। भारतीय अंडर-17 टीम में जगह बनाने के बाद उन्होंने तुर्की, सिंगापुर और सऊदी अरब में देश का प्रतिनिधित्व किया। अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में खेलने के अनुभव ने उनके आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी। आलोक का सफर बताता है कि राष्ट्रीय टीम तक पहुंचने के लिए प्रतिभा के साथ अनुशासन और नियमित अभ्यास कितना जरूरी है।
प्रदेश के विभिन्न आयु वर्गों की टीमों का हिस्सा बनने के बाद उन्होंने भारतीय अंडर-17 टीम की जर्सी हासिल की। अब उनकी नजर अगले पड़ाव भारतीय सीनियर टीम पर है। आलोक मानते हैं कि गोरखपुर में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। जरूरत है तो निरंतर मेहनत, अनुशासन और बेहतर प्रशिक्षण की। उनका सपना देश के लिए सीनियर स्तर पर खेलना और विश्व फुटबाल में भारत का नाम ऊंचा करना है।

टेनिस बाल से आइपीएल तक पहुंचे विशाल
राजमिस्त्री के बेटे विशाल निषाद ने क्रिकेट की शुरुआत किसी बड़े क्रिकेट अकादमी के चमकदार मैदान से नहीं, बल्कि टेनिस बाल से की। लेकिन प्रतिभा ने रास्ता खुद बनाया। मेहनत के दम पर उन्होंने प्रोफेशनल क्रिकेट तक का सफर तय किया और अपनी गेंदबाजी की खास शैली से पहचान बनाई। लेग स्पिन, कैरम बाल और गेंद को अप्रत्याशित ढंग से टर्न कराने की क्षमता उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
इसी प्रदर्शन ने आइपीएल 2026 में पंजाब किंग्स का ध्यान आकर्षित किया। फ्रेंचाइजी ने उन्हें 30 लाख रुपये के बेस प्राइस पर टीम में शामिल किया। अब यूपी टी-20 लीग में भी विशाल की फिरकी पर निगाहें रहेंगी। उनके सफर की खासियत यही है कि शुरुआत भले ही सीमित साधनों से हुई, लेकिन मंजिल क्रिकेट के सबसे बड़े मंचों तक पहुंच गई। विशाल की कहानी उन युवाओं को भरोसा देती है कि अवसर मिलने पर स्थानीय प्रतिभा भी बड़े मंच पर अपनी जगह बना सकती है।

2028 लॉस एंजिलिस ओलिंपिक के लिए पसीना बहा रहीं प्रीति
भारतीय हाकी टीम से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली गोरखपुर की बेटी प्रीति दुबे का अब अगला लक्ष्य अब 2028 में अमेरिका के लास एंजिलिस में होने वाले ओलिंपिक में देश के लिए खेलना है। इसको लेकर वह काफी मेहनत कर रहीं हैं। मूल रूप से खजनी क्षेत्र के भेउसा गांव निवासी प्रीति दूबे ने कक्षा छह से नौवीं तक की पढ़ाई वीर बहादुर सिंह स्पोर्ट्स कालेज से की। उसके बाद ग्वालियर एकेडमी चली गईं।
महज 17 वर्ष की उम्र में रियो डी जेनेरियो ओलिंपिक 2016 में हाकी स्टिक से बेहतर खेल का प्रदर्शन करने वाली फारवर्ड खिलाड़ी प्रीति को कई वर्षों तक टीम में वापसी के लिए कड़ी मेहनत करना पड़ा और अंतत: इसका फल उन्हें टीम में चयन के रूप में मिला है। इससे पूर्व 19 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंडर-23 सिक्स नेशन टूर्नामेंट बेल्जियम में बतौर कप्तान अपना अंतिम मैच खेला था। वर्ष 2016 में रियो ओलिंपिक के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब उनका अगला लक्ष्य भारतीय टीम का हिस्सा बन 2028 लास एंजिलिस ओलिंपिक में देश के लिए मेडल जीतना है।

हॉकी स्टिक से खेल निदेशक तक का सफर
कुछ खिलाड़ी खेलकर आगे बढ़ते हैं और कुछ अपने अनुभव से पूरे खेल तंत्र को दिशा देते हैं। डा.आरपी सिंह का सफर इसी दूसरी तस्वीर को सामने रखता है। भारतीय हाकी टीम के दिग्गज खिलाड़ी और कप्तान रहे डा.सिंह आज उत्तर प्रदेश के खेल निदेशक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। सियोल एशियन गेम्स-1986, बीजिंग एशियन गेम्स-1990 और एशिया कप-1989 में देश का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने पदक जीते।
1986 के लंदन विश्व कप में भी वह भारतीय टीम का हिस्सा रहे। सब-जूनियर से सीनियर राष्ट्रीय स्तर तक स्वर्ण पदक विजेता टीमों के सदस्य के रूप में उन्होंने हाकी की कई पीढ़ियों और स्तरों को करीब से देखा। मैदान का यही अनुभव बाद में प्रशासनिक जिम्मेदारी में उनकी ताकत बना।
2016 में लखनऊ में आयोजित जूनियर हाकी विश्व कप की व्यवस्था में उनकी भूमिका रही, जहां भारतीय टीम ने खिताब जीता। उनकी की यात्रा बताती है कि खेल का अनुभव मैदान की सीमा पर समाप्त नहीं होता। सही नेतृत्व मिले तो वही अनुभव खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों और पूरी खेल व्यवस्था के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।

मैदान के अनुभव को आनंदेश्वर ने बनाया प्रशासन की ताकत
पूर्चांचल के मैदान से प्रशासन तक पहुंचने परजे आनंदेश्वर पांडेय का सफर भी उन कहानियों में शामिल है, जिनमें खिलाड़ी का अनुभव बाद में नेतृत्व की ताकत बनता है। हैंडबाल के खिलाड़ी के रूप में उन्होंने खेल की गति, रणनीति और टीमवर्क को करीब से समझा। यही अनुभव आगे चलकर खेल प्रशासन की जिम्मेदारियों में काम आया। हैंडबाल के खिलाड़ी के रूप में राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में यूपी का प्रतिनिधित्व किया। 1977-78 में हैदराबाद और 1979 में पंजाब की राष्ट्रीय हैंडबाल प्रतियोगिताओं में उन्होंने प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया।
1979 में हैदराबाद में हुए 25वें राष्ट्रीय खेलों में भी उत्तर प्रदेश की टीम का हिस्सा रहे। खेल जीवन के बाद उन्होंने संगठन और प्रशासन में लंबी पारी खेली। वर्ष 1980 से उत्तर प्रदेश हैंडबाल संघ के सचिव की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने प्रदेश में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के आयोजन को गति दी।
राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय हैंडबाल संघ की तकनीकी समिति और चयन समिति के चेयरमैन, महासचिव तथा उपाध्यक्ष जैसे पदों पर रहे। भारतीय ओलिंपिक संघ में कार्यकारिणी सदस्य, संयुक्त सचिव और कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारियां भी निभाईं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एशियन हैंडबाल फेडरेशन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के साथ ओलिंपिक, एशियन और राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय दल के अधिकारी के रूप में भी योगदान दिया।
