पोल्ट्री फार्म का घाटे वाला 'फार्मूला': लागत बढ़ी, सब्सिडी घटी... गोरखपुर में ठंढा पड़ा क्रेज
गोरखपुर में कोविड के बाद पोल्ट्री फार्मिंग का आकर्षण कम हो गया है, जहाँ 2013 की नीति में 57 लोगों ...और पढ़ें

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण
HighLights
कोविड के बाद गोरखपुर में पोल्ट्री फार्मिंग का चार्म खत्म।
2013 नीति में 57, 2022 नीति में केवल दो फार्म खुले।
बढ़ी लागत और कम सब्सिडी ने लोगों की रुचि घटाई।
सुनील सिंह, गोरखपुर। कोविड के बाद पोल्ट्री फार्म का चार्म अब खत्म हो गया है। जहां, कुक्कुट विकास नीति 2013 में 57 लोगों ने लाभ लिया था। वहीं, संशोधित नीति 2022 में अब तक सिर्फ दो लोगों ने पोल्ट्री फार्म खोला है तो एक ने कुछ दिन पूर्व ही आवेदन किया है।
पशुपालन विभाग की ओर से वर्ष 2013 में पोल्ट्री फार्म को बढ़ावा देने के लिए कुक्कुट विकास नीति लागू की गई। इसमें 57 लोगों ने लाभ लिया था। 10 हजार पक्षी क्षमता के 37, 20 हजार के तीन व 30 हजार के 17 पोल्ट्री फार्म खुले थे। वहीं, 79 लोग प्राइवेट पोल्ट्री फार्म खोलकर अंडा का उत्पादन करते थे।
वर्ष 2020 व 21 में कोविड का दौर चला तो पोल्ट्री फार्म संचालकों को नुकसान उठाना पड़ा था। वर्ष 2022 में नीति में संशोधन हुआ। इसके बाद से सिर्फ दो लोगों ने पोल्ट्री फार्म खोला है। वहीं, सरदारनगर ब्लाक के शत्रुघ्नपुर गांव निवासी बबलू चौहान ने कुछ दिन पूर्व आवेदन किया है। इसके उलट बकरी व गाय पालन में लोगों की रूचि बढ़ी है। छह लोगों को मिलने वाले मिनी कृषक नंदिनी योजना का लाभ लेने के लिए 253 लोगों ने आवेदन किया था।
70 लाख रुपये से बढ़कर एक करोड़ की हुई योजना
10 हजार पक्षी के पोल्ट्री फार्म की पहले लागत 70 लाख रुपये थी। अब यह बढ़कर एक करोड़ रुपये हो गई है। 20 व 30 हजार के पोल्ट्री फार्म का लागत इसी अनुपात में बढ़ता है। इसमें 30 प्रतिशत रकम संचालक को खुद लगाना है। 70 प्रतिशत रकम बैंक से ऋण लेना है। योजना में पहले बैंक ऋण का पांच वर्ष तक 10 प्रतिशत ब्याज शासन की ओर दिया जाता था। अब यह सात प्रतिशत हो गया है।

