सबरंग: लोक आस्था में AI का 'श्रीगणेश', बदला बप्पा का स्वरूप
गोरखपुर में गणेश प्रतिमाओं का स्वरूप इंटरनेट और एआई के प्रभाव से तेजी से बदल रहा है, जहां ग्राहक अब ...और पढ़ें

श्री सिद्धि विनायक सेवा संस्था के लिए,पांडेयहाता के लिए बनी गणेश प्रतिमा को अंतिम रूप देने में जुटे कलाकार। जागरण
HighLights
गणेश प्रतिमाओं के डिजाइन में एआई और इंटरनेट का प्रभाव।
मूर्तिकारों के सामने नई डिजाइन बनाने की चुनौती बढ़ी।
गोरखपुर में गणेश प्रतिमाओं की मांग में भारी वृद्धि।
संगम दूबे, गोरखपुर। गणेश पूजा का रंग वही है, आस्था वही है, लेकिन गणपति की सूरत लगातार बदल रही है। कभी कारीगर अपनी कल्पना से प्रतिमा का स्वरूप तय करते थे, अब मोबाइल स्क्रीन पर आई तस्वीर मूर्तिकार के सामने रखी जाती है और कहा जाता है-ऐसी ही बनानी है। इंटरनेट मीडिया की रील, फोटो और अब एआइ से तैयार तस्वीरें गोरखपुर के मूर्तिकारों के लिए नए डिजाइन का आधार बन रही हैं।
हुमायूंपुर की गजानन समिति ने तो भगवान गणेश को भगवान जगन्नाथ की थीम में ढालने की कल्पना एआइ से निकली तस्वीर देखकर की। शायर माता समिति ने शेर की थीम पर गणेश प्रतिमा बनवाई। उधर 44 वर्षों से गोरखपुर में प्रतिमाएं गढ़ रहे बर्धमान के मूर्तिकार के सामने भी हर साल नई चुनौती है- ग्राहक की कल्पना को मिट्टी में उतारना। गणेश प्रतिमा के बदलते स्वरूप पर प्रस्तुत है संगम दूबे की रिपोर्ट।
शहर में गणेश पूजा की प्रतिमाओं का बाजार पिछले तीन दशक में तेजी से बदला है। पहले जहां पांच-दस छोटी प्रतिमाओं के आर्डर मिलते थे, वहीं अब गणेश पूजा के लिए करीब दो हजार प्रतिमाएं तैयार होती हैं। घरों के लिए सामान्यतः छोटी प्रतिमाओं की मांग रहती है, जबकि समितियां बड़े आकार और अलग थीम को प्राथमिकता दे रही हैं। प्रतिमाओं की कीमत दो हजार रुपये से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक बताई गई है।

सिर्फ गोरखनाथ मंदिर में बर्धमान से आए एक अनुभवी मूर्तिकार वसुदेव पाल के साथ करीब 70 कारीगर इस समय काम कर रहे हैं। मई से दीपावली तक गोरखपुर में रहकर वे गणेश, दुर्गा और लक्ष्मी की प्रतिमाएं तैयार करते हैं। उनकी बनाई प्रतिमाएं गोरखपुर के अलावा भैरहवा, नेपाल और बिहार के गोपालगंज व सीवान तक जाती हैं। बदलती पसंद ने कारीगरों के सामने समय और डिजाइन दोनों की चुनौती बढ़ा दी है।
बर्धमान जिले से आए इस मूर्तिकार की गोरखपुर से जुड़ी कहानी करीब 44 वर्ष पुरानी है। उम्र तब करीब 22 वर्ष रही होगी, जब दुर्गाबाड़ी में महंत अवेद्यनाथ की साधु की प्रतिमा बनाने के लिए उन्हें बुलाया गया था। शुरुआत में उन्होंने वहां संतों की करीब तीन सौ प्रतिमाएं बनाईं। इसके बाद मंदिर परिसर में ही जगह मिली और फिर यह जगह उनके लिए हर साल का ठिकाना बन गई। मई आते ही कारीगरों की टोली गोरखपुर पहुंचती है और दीपावली तक प्रतिमाएं आकार लेती रहती हैं।

गणेश, दुर्गा और लक्ष्मी तीनों की प्रतिमाओं के साथ मौसम बदलता है, लेकिन कारीगरों की दिनचर्या नहीं बदलती। सुबह सात बजे से रात दो बजे तक काम। दोपहर दो से चार बजे तक करीब दो घंटे का विश्राम। आज उनके साथ करीब 70 कारीगर काम करते हैं। उनका कहना है कि तीन-चार दशक पहले जहां पांच से दस प्रतिमाएं तैयार होती थीं, अब मांग कई गुना बढ़ चुकी है। सिर्फ गणेश पूजा के लिए गोरखपुर में करीब दो हजार प्रतिमाएं तैयार होती हैं।
छोटी प्रतिमाओं से बड़े आकार तक
करीब 35 वर्ष पहले छोटी-छोटी प्रतिमाओं का चलन ज्यादा था। अब समितियों में बड़े आकार की प्रतिमाओं की मांग बढ़ी है। घरों के लिए दो-तीन फीट से लेकर चार फीट तक की प्रतिमाएं पसंद की जाती हैं, जबकि सार्वजनिक पूजा में आकार लगातार बड़ा होता जा रहा है। गणेश प्रतिमाओं में करीब दो फीट से लेकर साढ़े 13 फीट तक की प्रतिमाएं तैयार हो रही हैं। कीमत भी आकार और डिजाइन के साथ बदलती है।

दो हजार रुपये से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक की प्रतिमाएं उपलब्ध हैं। बड़ी प्रतिमाएं सिर्फ गोरखपुर तक सीमित नहीं रहतीं। भैरहवां और नेपाल के दूसरे क्षेत्रों के साथ बिहार के गोपालगंज और सीवान तक भी यहां की प्रतिमाएं पहुंचती हैं। मूर्तिकार के सामने अब सिर्फ मिट्टी, रंग और औजार नहीं होते। मोबाइल की स्क्रीन भी होती है। पूजा समितियों के युवा सदस्य इंटरनेट मीडिया से तस्वीर खोजते हैं। पसंद आई तो फोटो सेव की और सीधे कारीगर के पास पहुंच गए।
कई बार तस्वीर किसी कलाकार की बनाई हुई होती है, तो कई बार एआइ से तैयार की गई। कारीगर को उसी भाव, उसी मुद्रा और उसी डिजाइन में प्रतिमा तैयार करने को कहा जाता है। मूर्तिकार के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है। वर्षों से परंपरागत प्रतिमाएं गढ़ते आए हाथों को अब ऐसी आकृतियां बनानी पड़ रही हैं, जिनका कोई पारंपरिक नमूना सामने नहीं होता। लेकिन पूजा समितियों की पसंद के आगे प्रयोग स्वीकार करने पड़ते हैं।

गणपति में जगन्नाथ की छवि
गजानन समिति, हुमायूंपुर उत्तरी का आठवां वर्ष है। समिति के मनीष गुप्ता, अजय गुप्ता, संगम गुप्ता और विशाल इस बार गणपति की प्रतिमा को लेकर कुछ अलग करना चाहते थे। मनीष के मित्र जगन्नाथपुरी गए थे। वहां की परंपरा और भगवान जगन्नाथ की छवि से प्रभावित होकर विचार आया कि गणेश जी को जगन्नाथ थीम से कैसे जोड़ा जाए। जवाब एआइ ने दिया। एआइ की मदद से एक तस्वीर तैयार की गई।
तस्वीर देखकर समिति ने मूर्तिकार से वैसी ही प्रतिमा बनाने को कहा। शुरुआत में मूर्तिकार कुछ हिचके। उन्हें डिजाइन पारंपरिक गणेश प्रतिमाओं से अलग लगा। समिति ने कई बार समझाया और अंततः कारीगर तैयार हुए। अजय गुप्ता, उपाध्यक्ष, समिति बताते हैं कि मार्च में जगन्नाथपुरी जाने और इंटरनेट मीडिया पर गणेश-जगन्नाथ से जुड़ी रील देखने के बाद विचार आया। एआइ से तस्वीर तैयार कराई गई और फिर उसी को प्रतिमा का आधार बनाया गया। प्रतिमा में जगन्नाथ थीम का साफा भी शामिल किया जा रहा है।

शेर की सवारी पर गजानन
शायर माता समिति के अंकुर सोनकर पिछले 13 वर्षों से गणेश प्रतिमा की स्थापना से जुड़े हैं। पिछले कुछ वर्षों से समिति लगातार शेर की थीम पर प्रतिमा तैयार करा रही है। इस बार भी प्रेरणा इंटरनेट मीडिया की एक रील से मिली। अंकुर ने तस्वीर मूर्तिकार को दिखाई। फिर उसी आधार पर प्रतिमा का आकार तय हुआ। यहां प्रतिमा बनवाना सिर्फ आर्डर देने तक सीमित नहीं है। अंकुर के साथ शाहरुख भी करीब 13 वर्षों से समिति से जुड़े हैं। दोनों प्रतिमा की बनावट से लेकर रंगाई-पुताई और वस्त्र पहनाने तक हर स्तर पर नजर रखते हैं। पसंद से लेकर विसर्जन तक की प्रक्रिया में वे सक्रिय भागीदारी निभाते हैं।
एक गणेश, कई कल्पनाएं
गणेश पूजा की प्रतिमा अब सिर्फ पूजा का केंद्र नहीं, समिति की पहचान भी बनती जा रही है। कोई थीम के जरिये अपनी अलग पहचान चाहता है, तो कोई इंटरनेट पर देखी आकृति को जमीन पर उतारना चाहता है। इसीलिए इस बार शीशे वाले गणेश की मांग भी सामने आई है। चमकदार शीशे और पारंपरिक प्रतिमा का मेल लोगों को आकर्षित कर रहा है।
मूर्तिकार के लिए हर नया डिजाइन एक नई परीक्षा है। एक समय था जब ग्राहक मूर्तिकार के पास आता था और कहता था गणेश जी की अच्छी प्रतिमा बना दीजिए। अब तस्वीर साथ आती है। उसमें हाथ की मुद्रा, मुकुट, वस्त्र, चेहरे की बनावट, वाहन और सजावट तक तय होती है। यानी कल्पना पहले कारीगर की होती थी, अब उसका बड़ा हिस्सा ग्राहक लेकर आता है।

परंपरा के बीच नई पीढ़ी की पसंद
गणेश पूजा में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है। पूजा समितियों में नए चेहरे आए हैं और उनके साथ प्रतिमा की पसंद भी बदली है। इंटरनेट मीडिया पर दिखने वाली नई आकृतियां कुछ ही दिनों में स्थानीय पूजा पंडालों की थीम बन जाती हैं। इससे प्रतिमाओं में विविधता बढ़ी है, लेकिन मूर्तिकारों पर समय पर काम पूरा करने का दबाव भी बढ़ा है। मांग इतनी बढ़ गई है कि कारीगर हर आर्डर समय से पूरा नहीं कर पाते। एक तरफ प्रतिमा का आकार बड़ा हुआ है, दूसरी तरफ डिजाइन जटिल हुए हैं।
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ऊपर से ग्राहक चाहता है कि इंटरनेट पर दिखाई गई तस्वीर जैसी ही प्रतिमा मिले। ऐसे में एक प्रतिमा तैयार करने में लगने वाला समय भी बढ़ जाता है। मूर्तिकारों के लिए सबसे बड़ी चिंता सिर्फ बढ़ती मांग नहीं है। उनके मुताबिक नई पीढ़ी इस पारंपरिक कला में रुचि नहीं ले रही। वर्तमान में काम कर रहे अधिकतर कारीगर पुरानी पीढ़ी से आते हैं। हाथों की यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़नी थी, लेकिन बदलते रोजगार विकल्पों के बीच युवा इससे दूर हो रहे हैं।
