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'सुविधा' की होड़ में पीछे छूटा 'नागरिक बोध', क्या अब अनुशासन का कोई मोल नहीं?

By Bhaskar SinghEdited By: Vivek Shukla
Published: Thu, 03 Sep 2026 09:15 AM (IST)

गोरखपुर में एक तेज रफ्तार कार से प्रचार सामग्री फेंकने से राहगीरों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई, जिससे नागरिक ...और पढ़ें

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भाष्कर सिंह, गोरखपुर। देवरिया रोड मोतीराम अड्डे और कुसम्ही की तरफ बुधवार को 11 बजे के आसपास एक तेज रफ्तार कार जा रही थी। चालक और सहचालक बार-बार हाथ निकालकर कुछ फेंक रहे थे। वे राहगीरों की तरफ पर्चे फेंक रहे थे, जो किसी डाक्टर की प्रचार सामग्री थी। पता नहीं डाक्टर का कितना प्रचार हो पाया, लेकिन इस हरकत से हमारे नागरिक बोध पर गंभीर प्रश्न चिह्न लग गया।

उनकी इस हरकत से कोई गंभीर हादसा भी हो सकता है। हम भारतीय लोकतंत्र का अर्थ कुछ भी करने की आजादी मानने लगे हैं, जिसमें समाज और राष्ट्र के लिए अति आवश्यक अनुशासन भी महत्व नहीं रखता। हमें हमारी इच्छा ही सर्वोच्च लगती है। हम अपनी सुविधा देखते हैं। हाईवे पर चलने का अनुशासन होता है, लेकिन लखनऊ रजिस्ट्रेशन की कार में सवार शायद प्रचार सामग्री बांटने के उद्देश्य से निकले थे।

निश्चित रूप से यह उनका अधिकार है, लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने आम राहगीरों की सुरक्षा को प्राथमिकता में नहीं रखा। दोनों खिड़कियों से हाथ बाहर निकले हुए थे, हथेली में कुछ पकड़े हुए। लोगों को देखते कुछ उनकी ओर उछाल दिया जाता, एक बिटिया तो डर गई। साइकिल हाथ में पकड़े पैदल ही अपनी किसी परिचित महिला के साथ जा रही बिटिया तुरंत रुक गई, यदि उसने साइकिल नहीं थामी होती तो निश्चित मानें कि वह पीछे कूद जाती। इसी प्रकार मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी महिला का हाल हुआ, गोद में नवजात था, वह भी चिहुक गई।

कार की खिड़की से प्रचार सामग्री फेंकने का निर्णय सोच-समझकर ही लिया होगा। समय बचाने का विचार रहा होगा, लेकिन ऐसा विचार तभी आया होगा जब मन-मस्तिष्क में नागरिक बोध की बात ही नहीं होगी। यह बात गंभीर विमर्श की है, हम क्यों नहीं नागरिक बोध को प्राथमिकता में रखते हुए कोई काम करते हैं-निर्णय करते हैं। क्यों हम अपनी सुविधा के अनुसार कार्य करते हैं। हम हमेशा अधिकारों की बात करते हैं, कर्तव्यों की नहीं।

जब कोई व्यक्ति सामान्य शिष्टाचार के विरुद्ध कार्य करता है तो हमें खराब लगता है, लेकिन जब वही काम हम करते हैं तो शायद ही कभी अपने से कोई प्रश्न करते हैं। इस घटना को समाचार को रूप में देखा जाना उचित नहीं होगा, यह घटना एक शीशे की तरह है। ऐसी तमाम घटनाओं को हम हर प्रतिदिन देखते हैं, लेकिन उसका संज्ञान नहीं लेते। उन पर विचार नहीं करते, हम ऐसी घटनाओं को स्वीकार कर चुके हैं, लेकिन ऐसा करना नागरिक के रूप में सही नहीं होगा।

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