महराजगंज, जेएनएन। महराजगंज के लक्ष्मीपुर क्षेत्र के कोल्हुआ उर्फ सिंहोरवा शिव मंदिर परिसर से भ्रमण पर निकला फ्रांसीसी परिवार 25 दिन बाद फिर शनिवार की शाम मंदिर परिसर में वापस लौट आया है। इस दौरान फ्रांसीसी परिवार के सदस्यों को देखकर ग्रामीणों के चेहरे खिल उठे। महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों ने परिवार के सभी सदस्यों का स्वागत कर उनका कुशलक्षेम पूछा और जलपान कराया।

पांच माह तक यहीं रुका था पूरा परिवार

भ्रमण पर निकले फ्रांस के टूलोज शहर निवासी पैट्रीस पैलारे अपने परिवार के साथ बीते 22 मार्च को सोनौली पहुंचे थे, लेकिन कोरोना महामारी के कारण घोषित लाॅकडाउन की वजह से नेपाल में नहीं जा सके। इसलिए वह पत्नी वर्जिनी, बेटी ओफली, लोला व बेटा टाॅम के साथ कोल्हुआ शिव मंदिर परिसर में ठहर गए। पांच माह के बाद परिवार के सदस्यों ने जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचकर उत्तराखंड पर्यटन के लिए अनुमति मांगी थी। 26 अगस्त को फ्रांसीसी परिवार दिल्ली के लिए रवाना हो गया। 

मंदिर परिसर में ही ठहरा है परिवार

दिल्ली स्थित फ्रांसीसी दूतावास से आवश्यक कार्य निपटाने के बाद परिवार रास्ते में विभिन्न पर्यटन स्थलों काे देखते हुए उत्तराखंड पहुंचा। फिर वहां के प्रमुख धार्मिक स्थलों का दर्शन कर पुनः 25 दिन बाद शनिवार को मंदिर परिसर में लौट आया है। थानाध्यक्ष पुरंदरपुर शाह मोहम्मद ने बताया कि फ्रांसीसी परिवार के सदस्य वापस मंदिर परिसर में लौट आए हैं। उनकी सुरक्षा के लिए दो पुलिस कर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है।

सरहद खुलने के इंतजार में परिवार 

बीते 21 मार्च से महराजगंज जिले के कोल्हुआ में रह रहे फ्रांसीसी परिवार को भारत-नेपाल की सरहद खुलने का इंतजार है। भारत में लॉकडाउन की समाप्ति के बाद इन्हें उम्मीद है कि अब धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौट आएगी। सभी एक स्वर में कहते हैं कि भारत की बहुत याद आएगी। यहां ग्रामीणों का जो प्यार मिला वह अन्य किसी देश में संभव नहीं है। पैट्रीस पैलारे ने कहा कि सीमा खुलते ही वह परिवार के साथ नेपाल होते हुए अपनी यात्रा को आगे बढ़ाएंगे, लेकिन भारत को भूलना मुश्‍किल है। 

दिनों दिन गाढ़ा होता गया टूलोज व सिंहोरवा का नाता

गुलाबी शहर टूलोज से विश्व भ्रमण का सपना संजोए पैट्रीस पैलारे उनकी पत्नी वर्जिनी, बेटियां ओफली, लोला व बेटा टाम बीते फरवरी माह में घर से निकले थे। ढाई माह पूर्व जब फ्रांसीसी कुनबा कोल्हुआ में पहुंचा तो ग्रामीण अचरज में पड़ गए थे। भाषा संकट के चलते एक दूसरे से संवाद नहीं हो पा रहा था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता पैट्रीस पैलारे और उनका कुनबा ग्रामीणों के रंग में रंग बस गया। पहले इशारों में बात होती थी। अब ये लोग ग्रामीणों से हिंदी व भोजपुरी में संवाद करते हैं। लोला व ओफली के मुंह से 'इंडिया की बहुत याद आएगी' शब्‍द सुन ग्रामीणों की आंखे भर जातीं हैं। 

पसंद आ रहा गन्ने का जूस व भूजा

फ्रांसीसी परिवार को भारत का वातावरण ही नहीं यहां का खान -पान भी पसंद आ गया है। पुजारी बाबा हरिदास के साथ दोनों समय यह लोग मंदिर परिसर में ही भोजन करते हैं। दाल, चावल व साग इनका पंसदीदा भोजन है। गन्ने का जूस व भूजा भी इन्हें पसंद आ गया है।

 

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