गोरखपुर, जेएनएन। नवरात्र शुरू होने में अभी दो हफ्ते का वक्त है लेकिन इसकी चमक और धमक अभी से दिखाई देने लगी है। कहीं मां भगवती की प्रतिमाओं में रंग भरते कलाकार तो कहीं गरबा-डांडिया की खनक से गूंजते सभागार। कुल मिलाकर माहौल अभी से उत्सवी हो चला है। गुजरात-राजस्थान के इन पारंपरिक लोकनृत्यों को लेकर गोरखपुर के लोगों का क्रेज तो देखते बन रहा है। खासतौर से महिलाओं में इसे सीखने की ललक क्रेज की गवाही है।

इसे देखते हुए कई जगह पर इनकी कार्यशालाएं भी शुरू हो चुकी हैं। चुस्ती-फुर्ती के साथ घर का काम निपटाने के बाद महिलाएं कार्यशालाओं तक पंहुच रहीं हैं, इन नृत्यों के डांसिंग स्टेप सीखने के लिए। रंग-बिरंगे परिधानों में सजीं इन महिलाओं का उत्साह अद्भुत है। आस्था का पर्व है और मस्ती का माहौल। कुल मिलाकर यूं लग रहा कि इस नवरात्र पर डांडिया-गरबा पर समूचा गोरखपुर पूरी दक्षता के साथ झूमने को तैयार है।

बढ़ रहा डांडिया का क्रेज

पांच वर्ष पूर्व गुजरात से पहली बार कोरियोग्राफर आए तो यहां की महिलाओं में डांडिया सीखने की ललक देखी। वह एक माह का प्रशिक्षण था। जिसके लिए नब्बे महिलाओं ने रजिस्ट्रेशन करवाया। तब से प्रतिवर्ष सीखने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है साथ ही साथ प्रशिक्षण केंद्र भी। हर किसी के लिए इन लोकनृत्यों में भाग लेने की अपनी वजह है। किसी के लिए आस्था, किसी के लिए शौक, किसी के लिए फिटनेस जबकि ज्यादातर का कहना है कि इस एक माह में हम अपने बचपन को दोबारा जी रहे हैं।

महिलाएं ले रही हैं प्रशिक्षण

गुजरात के डांडिया व गरबा से शहर को परिचित कराने वाले कीर्ति रमण दास बताते हैं कि गुजरात में रहने वाली मेरी बहन डांडिया क्वीन चुनी गई। इसके बाद मेरा ध्यान इस तरफ गया कि क्यों न अपने शहर को इन लोकनृत्यों से समृद्ध किया जाए। मेरे आमंत्रण पर बहन कोरियोग्राफर की टीम के साथ यहां आई। यहां की महिलाओं की रुचि और संख्या देखकर हम सबका उत्साह बढ़ गया। पांच वर्ष हो चुके हैं। साल-दर-साल प्रशिक्षण लेने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है।

इन स्थानों पर चल रहा प्रशिक्षण

शहर में कई स्थानों पर डांडिया का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें गोरखपुर क्लब, निपाल लॉज, गीता वाटिका, आर्यनगर स्थित जैन मंदिर, राप्ती नगर स्थित वर-वधू मैरेज हॉल, जटाशंकर स्थित माता मंदिर प्रमुख हैं। एक माह तक चलने वाले इस प्रशिक्षण शिविर में एक से डेढ़ घंटे तक नृत्य सिखाया जाता है। इनमें घरेलू व कामकाजी हर तरह की महिलाएं हैं।

गोरखपुर क्लब में प्रशिक्षित कर रही कोरियोग्राफर काव्यांशी त्रिपाठी कहती हैं शुरूआती दो-तीन दिनों में पहली बार सीख रही महिलाओं को थोड़ी दिक्कत आती है पर उसके बाद पैर उठने लगते हैं। निपाल लॉज में प्रशिक्षण दे रहे कोरियोग्राफर प्रवीण राज कहते हैं कि हम दूसरे राज्य की संस्कृति व कला को आत्मसात कर सकें तो इससे अच्छी बात क्या होगी। इसीलिए डांडिया सिखाने की पहल की। डांडिया-गरबा का खास शौक रखने वाली अर्पिता चित्रा उपाध्याय बताती हैं कि उन्हें सीखते हुए लगातार तीसरा साल है। इंतजार रहता है कि कब नवरात्र आए और मैं डांडिया खेलूं। ऐसा लगता है जैसे कॉलेज के दिनों को दोबारा जी रही हूं। शिक्षिका रश्मि सिंह अपनी व्यस्तता के बावजूद भी डांडिया प्रशिक्षण शिविर का हिस्सा बनती हैं। कहती हैं, डांडिया के लिए समय निकाल ही लेती हूं। डांडिया-गरबा का उत्साह जीवन में नई उर्जा का संचार करता है।

डांडिया रास यानी आनंद उत्सव

डांडिया एक तालबद्ध और उल्लास से भरा नृत्य है। इसकी शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण संग राधा और गोपियों की रासलीला से मानी जाती है। इसमें  10-12 इंच लंबी डंडियां लड़ाकर ताल से ताल मिलाया जाता है।

 मां दुर्गा को भाता है गरबा

नवरात्र के दिनों में गरबा के जरिए मां को प्रसन्न करने की कोशिश की जाती है। घट स्थापना के बाद इस नृत्य की शुरुआत होती है। यही कारण है कि हर डांडिया नाइट में सजे हुए घट दिखाई देते हैं। इस नृत्य में डंडियों की जगह ताली का इस्तेमाल किया जाता है।

Posted By: Pradeep Srivastava

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