गोरखपुर, डॉ. राकेश राय। स्वाधीनता आंदोलन में पूर्वांचल के योगदान की चर्चा चौरी चौरा जनाक्रोश की चर्चा के बिना पूरी हो ही नहीं सकती। चार फरवरी 2022 में हुए इस जनविद्रोह ने न केवल समूचे राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा बदल दी बल्कि अंग्रेजी हुकूमत को भी हिलाकर रख दिया। यही वह घटना थी, जिसकी जानकारी मिलने के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया। उधर घटना की पूरी हकीकत जाने बिना सत्र न्यायालय से 172 लोगों को फांसी की सजा सुना दी गई।

बाबा राघवदास और महामना मदन मोहन मालवीय के प्रयास से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 153 लोग निर्दोष करार दिया पर 19 लोगों को फांसी से नहीं बचाया जा सका। जागरण स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ पर इस युगांतरकारी घटना को एक बार फिर से याद दिलाने की कोशिश कर रहा है। विद्रोह में बलिदान हो जाने वाले देशभक्तों को श्रद्धांजलि दे रहा है। आगे पढ़िए पूरी रिपोर्ट...

स्वाधीनता आंदोलन की महत्वपूर्ण कड़ी थी चौरी चौरा घटना

चौरी चौरा की घटना महज एक घटना नहीं बल्कि स्वाधीनता आंदोलन की महत्वपूर्ण कड़ी थी। इतिहासकार प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी इस घटना को महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का हिस्सा मानते हैं। इसे जलियांवाला बाग की घटना से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि चौरी चौरा को यदि राष्ट्रीय फलक पर समझना है तो जलियांवाला बाग की घटना तक जाना ही होगा। उनका कहना है कि चौरी चौरा का आक्रोश जलियांवाला बाग की घटना का प्रत्युत्तर था, परंतु दुर्भाग्यवश घटना ने असहयोग आंदोलन को ही समाप्त कर दिया।

जुलूस निकालने वाले निहत्थे स्वयंसेवकों पर दारोगा ने चलवाई गोली

प्रो. हिमांशु बताते हैं कि घटना में ज्यादातर लोग असहयोग से जुड़े हुए स्वयंसेवक थे, जो ग्रामीण अंचल में मदिरा और मांस के बहिष्कार को आगे बढ़ा रहे थे। एक फरवरी 1922 को ऐसे ही एक स्वयंसेवक भगवान अहीर की चौरी चौरा के तत्कालीन दारोगा गुप्तेश्वर सिंह ने पिटाई कर दी। जानकारी मिलने पर स्वयंसेवकों के दल ने भगवान अहीर की पिटाई के खिलाफ थाने तक जुलूस निकाला। उसके बाद की घटनाक्रम जलियांवाला की घटना की तरह ही हुआ। जुलूस निकालने वाले निहत्थे स्वयंसेवकों पर दारोगा गुप्तेश्वर सिंह ने पहले लाठीचार्ज करवाया और फिर गोली चलवा दी, जिसमें तीन स्वयंसेवक मारे गए।

देशभक्तों ने दारोगा की गर्भवती पत्नी को जाने का दिया सुरक्षित मार्ग

साथियों पर गोली चलता देख जुलूस में शामिल लोग उग्र हो गए और उन्होंने थाने में आग लगा दी, जिससे सिपाही जल गए। विद्रोह के उस माहौल में देशभक्तों ने विवेक का परिचय दिया और थानाध्यक्ष गुप्तेश्वर सिंह की गर्भवती पत्नी को सुरक्षित जाने का मार्ग दिया। घटना की जानकारी जब महात्मा गांधी की दी गई तो उन्होंने असहयोग आंदोलन स्थगित करने का निर्णय ले लिया, जिसका उस समय काफी विरोध भी हुआ क्योंकि वह आंदोलन भी असहयोग आंदोलन का हिस्सा ही था।

घटना के बाद शुरू हुआ पुलिस का तांडव

चौरी चौरा की घटना के बाद एक बार फिर पुलिस का तांडव शुरू हुआ। घटना से जुड़े लोगों के साथ-साथ निर्दोष लोगों पर भी जमकर अत्याचार हुआ। बड़ी संख्या में लोगों पर गोरखपुर सत्र न्यायालय में मुकदमा चलाया गया। घटना की हकीकत जाने बिना 172 लोगों को फांसी की सजा सुना दी गई। हाईकोर्ट में पैरवी के लिए सात दिन का समय दिया गया।

बाबा राघवदास के अनुरोध पर महामना ने की मुकदमे की पैरवी

सत्र न्यायालय के निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में पैरवी के लिए बाबा राघवदास आगे आए। उन्होंने चंदा इकट्ठा कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वाद दाखिल कराया। मुकदमा लड़ने के लिए महामना मदन मोहन मालवीय से अनुरोध किया। वकालत छोड़ चुके महामना ने बाबा राघवदास के अनुरोध पर पूरी क्षमता से मुकदमे की पैरवी की। उन्होंने हाईकोर्ट में साबित कर दिया कि घटना गैर इरादतन थी। उनकी जोरदार पैरवी का ही परिणाम रहा कि न्यायालय की 172 लोगों को हुई फांसी की सजा को 19 लोगों में परिवर्तित किया। साफ है कि इस मामले में बाबा राघवदास और महामना जैसे देशभक्त अगर आगे नहीं आए होते तो सभी 172 को फांसी के फंदे से लटका दिया जाता।

Edited By: Pragati Chand