गोरखपुर, जेएनएन। जंग-ए-आजादी में गोरखपुर की भूमिका स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। यहां के लोगों ने 1857 की क्रांति से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक में देश की आजादी के लिए कुर्बानी दी है। तरकुलहा देवी मंदिर में 1857 की क्रांति से जुड़े शहीद बंधु सिंह की वीरता के किस्से गूंजते हैं तो चौरीचौरा शहीद स्थल ने स्वतंत्रता संग्राम की एक बारगी दिशा ही बदल कर रख दी थी। डोहरिया कलां में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गोरखपुर के आजादी के दीवानों ने ब्रिटिश हुकूमत से सीधा मोर्चा लिया और देश के लिए शहीद हो गए थे। महान क्रांतिकारी पं. राम प्रसाद बिस्मिल की शहादत इसी गोरखपुर में हुई थी। खूनीपुर मोहल्ले का तो नाम ही आजादी के लिए खून बहाने से मिला। गणतंत्र दिवस वह अवसर है, जब हम आजादी हासिल करने में गोरखपुर की भूमिका को याद करें और क्रांतिकारियों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यहां के लोगों को उनपर गर्व का अवसर दें।

चौरीचौरा ने मोड़ दिया स्वतंत्रता आंदोलन का रुख

गोरखपुर शहर से 22 किलोमीटर दूरी पर स्थित चौरीचौरा वह स्थान है, जहां घटी एक घटना ने एक बारगी स्वतंत्रता आंदोलन का रुख मोड़ दिया था। दो वर्ष से चल रहे असहयोग आंदोलन को इसी घटना की वजह से महात्मा गांधी ने स्थगित कर दिया था। पांच फरवरी, 1922 को गोरखपुर के चौरीचौरा में होने वाला यह कांड शायद देश का पहला ऐसा कांड है, जिसमें पुलिस की गोली खाकर जान गंवाने वाले आजादी के परवानों के अलावा गुस्से का शिकार बने पुलिस वाले भी शहीद माने जाते हैं। पुलिसवालों को अपनी ड्यूटी निभाने के लिए शहीद माना जाता है तो आजादी की लड़ाई में जान गंवाने वालों को सत्याग्रह के लिए।

किस्सा यह है कि 1920 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को देश से निकालने के लिए असहयोग का बिगुल फूंक दिया। गांधीजी की शर्त थी कि विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाए, लेकिन अङ्क्षहसात्मक तरीके से। आंदोलन पूरे रौ में था, उसी दौरान पांच फरवरी, 1922 को चौरीचौरा के भोपा बाजार में सत्याग्रही इकट्ठा होकर जुलूस निकाल रहे थे। तत्कालीन थानेदार ने जुलूस को अवैध घोषित किया और उसे रोकने के क्रम में एक सिपाही ने एक सत्याग्रही की गांधी टोपी को पांव से रौंद दिया। उसके बाद सत्याग्रही आक्रोशित हो गए। विरोध हुआ तो पुलिस ने फायङ्क्षरग शुरू कर दी, जिसमें 11 सत्याग्रही शहीद हो गए जबकि चार दर्जन से ज्यादा घायल हो गए। गोली खत्म हुई तो पुलिसकर्मी थाने की ओर भागे। साथियों पर गोली चलने से नाराज सत्याग्रहियों ने उन्हें थाने में जाते देखा तो पूरे थाने को ही घेर लिया और उसमें आग लगा दी। इससे थाने में मौजूद 23 पुलिसकर्मियों की जलकर मौत हो गई। बाद में इसके लिए 19 सत्याग्रहियों को दोषी करार देते हुए फांसी दी गई। घटना की जानकारी जब गांधीजी को मिली तो उन्होंने असहयोग आंदोलन स्थगित करने का फैसला ले लिया। उसके बाद यह स्थल इतिहास के पन्ने में इस तरह दर्ज हो गया कि आजादी की लड़ाई की चर्चा इसके बिना पूरी ही नहीं होती।

डोहरिया कलां में नौ रणबांकुरों ने सीने पर खाईं थी गोलियां

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के ऐलान पर 'करो या मरोÓ का नारा लगाते हुए 23 अगस्त,1942 को सहजनवां के डोहरिया कलां में आजादी के दीवानों ने ब्रिटिश हुकूमत से सीधा मोर्चा लिया था। नौ रणबांकुरों ने सीने पर गोलियां खार्इं थी और देश के लिए शहीद हो गए। हुआ यूं कि नौ अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी ने देश में भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया। उनका आह्वान सहजनवां के डोहरिया कलां तक भी पहुंचा। आजादी के दीवानों ने भारत माता का नारा लगाते हुए आंदोलन से सीधे जुडऩे की तैयारी शुरू कर दी। 23 अगस्त की तारीख मुकर्रर हुई, क्षेत्र में इसके लिए बिगुल फूंकने की। तय समय पर भारी तादाद में लोग जुटे। जब लोगों ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगाना शुरू किया तो तत्कालीन कलेक्टर एमएस मास और उनके अधीनस्थ अधिकारियों और पुलिसकर्मियों ने इस आंदोलन पर लगाम लगाने की पुरजोर कोशिश की। बावजूद इसके जब विरोध का सिलसिला आगे बढ़ा तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया। भीड़ ने उसका जवाब ईंट-पत्थर से दिया। ऐसे में पुलिस ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं, जिसका शिकार होकर नौ लोग वहीं शहीद हो गए जबकि 23 गंभीर रूप से घायल हुए। सिर्फ इतना ही नहीं अंग्रेजों ने पूरे डोहरिया गांव में आग लगा दी और गांव वालों पर जमकर जुल्म ढाया। देश आजाद हुआ तो यह स्थल आजादी की लड़ाई के इतिहास के पन्ने में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया।

गोरखपुर जेल में हुई बिस्मिल को फांसी

जंग-ए-आजादी के इतिहास में गोरखपुर का नाम जिन घटनाओं के लिए दर्ज है, उनमें पं. राम प्रसाद बिस्मिल की शहादत प्रमुखता से शामिल है। 19 दिसंबर, 1927 को गोरखपुर जेल की कोठरी नंबर सात में उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाया गया। वह फांसी घर तो जेल में आज भी मौजूद है ही, लकड़ी का फ्रेम और लीवर भी आज तक सुरक्षित है। यहां तक कि बिस्मिल से जुड़े जेल के दस्तावेज और बिस्मिल के सामानों की सूची भी जेल में संरक्षित है। जेल के अंदर बनाया गया बिस्मिल स्मारक और स्मृति उपवन उनके प्रति राष्ट्र के समर्पण की तस्दीक है। शाहजहांपुर के रहने वाले पंडित बिस्मिल को फांसी काकोरी में खजाना लूटने को लेकर हुई।

क्रांतिकारियों को सजा के लिए बनी थी मोती जेल

बसंतपुर मोहल्ले में लालडिग्गी के सामने मौजूद एक जर्जर इमारत वहां जाने वाले हर उस व्यक्ति का ध्यान खींचती है, जिन्हें अपनी विरासत से लगाव है। कम ही लोगों को पता होगा कि वह जर्जर इमारत कभी मोती जेल के नाम से मशहूर थी, जिसका इस्तेमाल अंग्रेज क्रांतिकारियों को सजा देने के लिए किया करते थे। इस परिसर में एक कुआं भी है, जिसे कभी खूनी कुआं कहा जाता था। बताते हैं कि अंग्रेज कुएं को फांसी के लिए इस्तेमाल करते थे। इसका सर्वाधिक प्रयोग अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति के दौरान किया। क्रांतिकारी शाह इनायत अली को फांसी इसी कुएं में दी गई थी।

क्रांतिकारियों की शहादत का गवाह घंटाघर

शहर के व्यस्ततम बाजार उर्दू में खड़ी मीनार सरीखी इमारत घंटाघर अपने-आप में तमाम क्रांतिकारियों की शहादत और उनकी गौरव-गाथाओं को समेटे हुए है। इसके निर्माण के इतिहास में जाएं तो आज जहां घंटाघर है। 1857 में वहां एक विशाल पाकड़ का पेड़ हुआ करता था। इसी पेड़ पर पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अली हसन जैसे देशभक्तों के साथ दर्जनों स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी गई थी। 1930 में रायगंज के सेठ राम खेलावन और सेठ ठाकुर प्रसाद ने पिता सेठ चिगान साहू की याद में इसी स्थान पर एक मीनार सरीखी ऊंची इमारत का निर्माण कराया, जो शहीदों को समर्पित थी। उस इमारत की पहचान आज घंटाघर के रूप में है।

खूनीपुर में बहा था सैकड़ों क्रांतिकारियों का खून

उर्दू बाजार के दायरे में आने वाले मोहल्ले खूनीपुर का नाम ही इस बात की तस्दीक है कि यह महज एक मोहल्ला ही नहीं बल्कि  तारीख है जंग-ए-आजादी की। इस इलाके में रहने वाले बुजुर्गों के मुताबिक ङ्क्षहदुस्तान की पहली जंग-ए-आजादी 1857 में इस मोहल्ले के लोगों ने बढ़चढ़ भागीदारी की। जब अंग्रेजों को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने वहां जमकर खून-खराबा किया। मोहल्ले में इतना खून बहा कि मोहल्ले की पहचान ही खून शब्द से जुड़ गई। यहां शहीदों की मजारों की बड़ी तादाद में मौजूदगी मोहल्ले के नाम की पीछे के ऐतिहासिक तथ्य की गवाही है।

तरकुलहा देवी को चढ़ती थी अंग्रेजों की बलि

शहर से 20 किलोमीटर दूर मौजूद तरकुलहा देवी मंदिर में जंग-ए-आजादी की पहली लड़ाई के दौरान अंग्रेजों की बलि चढ़ती थी। दरअसल डुमरी रियासत के बाबू बंधु सिंह मां के बहुत बड़े भक्त थे। जब पूरे देश में आजादी की पहली हुंकार उठी, गुरिल्ला युद्ध में माहिर बाबू बंधू सिंह उसमें शामिल हो गए। वह अंग्रेजों से गुरिल्ला युद्ध लड़ते और मां के चरणों में उनकी बलि चढ़ा देते थे। जल्द ही एक गद्दार ने बंधु सिंह के बारे में उन्हें पूरी जानकारी दे दी। इसके बाद अंग्रेजों ने जाल बिछाकर उन्हें पकड़ लिया और 12 अगस्त, 1857 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया। 

Posted By: Satish Shukla

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