नंदलाल तिवारी, गोंडा: सियासी रण तैयार है। सेनापति कमर कस रहे हैं। दलों में महारथियों को लेकर जोर अजमाइश चल रही है। ऐसे में बुजुर्गों की जुबां पर पहले के चुनाव की खूबियां छाई हुई है। 1962 व 67 के चुनाव की फिजां कुछ और ही थी। उस वक्त हरेक व्यक्ति अपने नेता से सीधे मिल सकता था। चुनाव के वक्त उम्मीदवार हर घर के दरवाजे पर दस्तक देते थे। एक-एक से मिलते थे। यही नहीं, अगर किसी मतदाता की किसी नेता से कोई नाराजगी रहती थी तो वह सीधे बात करता था। नेता भी उसकी बात को समझते थे। उसे मनाने का प्रयास करते थे, लेकिन अब पहले जैसा माहौल नहीं है।

साहबगंज निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक डा. संतोष कुमार द्विवेदी कहते हैं कि पहले राजनीतिक व्यक्ति का एक अलग किरदार होता था। मतदाता चाहे जिस दल का हो, नेता सभी की बात सुनते थे। आज की तरह यह नहीं देखा जाता था कि कौन किसका करीबी था। ----------

खुद जाकर करते थे मदद

- चाहे वह बाबू ईश्वर सरन हो या फिर त्रिवेणी सहाय, अगर कोई परेशान व्यक्ति उनके पास अपनी समस्या लेकर आता था तो वह उसके निराकरण के लिए संबंधित अफसर तक जाते थे। वहां पर रौब नहीं, बल्कि संबंधित अफसर से शालीनता पूर्वक अपनी बात कहते थे।

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हर किसी की रखते थे खबर

- पहले नेता अपने क्षेत्र के मतदाताओं के बारे में पूरी जानकारी रखते थे। मसलन, कोई किसी संकट में तो नहीं है, कोई बीमार से तो नहीं जूझ रहा है। अगर कोई बीमार रहता था तो नेता उसे खुद अस्पताल पहुंचाते थे। बकौल, डा. संतोष द्विवेदी का कहना है कि पहले के नेताओं में और अब के नेताओं में काफी अंतर है। पहले आप अपने नेता से सीधे मिल सकते थे, लेकिन अब बीच में लोग खड़े हैं। इसने काफी हद तक राजनीति को प्रभावित किया है।

Edited By: Jagran