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नागपंचमी पर बांकी झील में लगेगा मेला, कपटी को दंड देने की है पौराणिक कथा

Published: Sun, 16 Aug 2026 03:47 PM (IST)

गोंडा की बांकी झील नागपंचमी के दिन एक कपटी को दंड देने के लिए अर्धचंद्राकार हो गई थी। इस दिन ...और पढ़ें

बांकी झील में नौकायन करते नाविक। जागरण

 बांकी झील में नौकायन करते नाविक। जागरण

HighLights

  1. बांकी झील नागपंचमी पर कपटी को दंड देने को अर्धचंद्राकार हुई।

  2. झील के तट पर नागदेवता और शिव मंदिर में पूजा होती है।

  3. नागपंचमी पर यहां विशाल मेला लगता है, पुरानी परंपरा जारी।

जागरण संवाददाता, गोंडा। एक कपटी को दंड देने के लिए राजगढ़ अमीनपुर गांव स्थित बांकी झील नाग पंचमी के दिन ही अर्धचंद्राकार हो गई थी, तब से इस झील के किनारे जुटकर श्रद्धालु पूजन-अर्चन करते है। नौ किलोमीटर लंबी बांकी झील के घाट पर नागदेवता,भगवान शिव समेत देवी मंदिर की स्थापना है। नागपंचमी पर यहां मेला लगता है।

किवंदतियों के अनुसार, यदि कोई भूखा-प्यासा पीपल के पेड़ के नीचे सच्चे भाव से भोजन पानी की इच्छा प्रकट करता था तो कुछ ही क्षणों में बांकी झील में नाव प्रकट हो जाती थी। नाव में स्वर्णपात्र होता था, जो स्वादिष्ट व्यंजन व पेय से भरा रहता था। इसे ग्रहण कर भूखे व प्यासे संतुष्ट हो जाते थे।

इसके बाद वे पात्र को साफकर नाव में छोड़ देते थे, जो गायब हो जाता था। एक दिन नाग पंचमी के दिन ही एक कपटी ने स्वादिष्ट व्यंजन की याचना की। भोजन करने के बाद वह स्वर्णपात्र लेकर जाने लगा, तभी झील ने अपनी सीमाएं लांघकर उसे घेर लिया और डुबोकर मार डाला।

तभी से यह झील अर्धचंद्राकार हो गई। इस घटना को सुनने के बाद राजा पृथ्वी सिंह ने यहां मेला लगाते हुए पूजन-अर्चन शुरू कराया, तब से यह परंपरा चली आ रही है।

मोहित व सभासद राजेश रस्तोगी का कहना है कि राजगढ गांव में यहां के राजा पृथ्वी सिंह ने झील किनारे बाग लगवाकर नागपंचमी के अवसर पर मेला लगवाया था।

सिसई जोगा के प्रधान रामसभा तिवारी कहते हैं कि झील के तट पर लगा पीपल का पेड़ उस घटना का साक्षी है, जिसके सामने झील ने दुष्ट को दंड दिया था, इसलिए पूजा की जाती है।

झील के तट पर शिवजी व नाग देवता का होता पूजन

झील के तट पर स्थापित नाग देवता की प्रतिमा पर क्षेत्र श्रद्धालु चावल,दूध,लौंग अर्पित करते हैं। आटे से नाग बनाकर उसकी भी पूजा करते हैं, इससे नागदेवता वर्ष भर उनकी रक्षा करते हैं।

यही नहीं श्रद्धालु आज भी झील के तट पर बने शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ व पीपल की पूजा करते हैं। झील में कमल के फूल व पुरईन के पत्तों से जलाभिषेक अधिक पुण्यदायक है। राष्ट्रध्वज के साथ नौकायन करते हुए अखिलेश ने कहा कि यहां नौका विहार की परंपरा सदियों पुरानी है।