गोंडा : जल ही जीवन है, ये लाइनें किताबों में आपने जरूर पढ़ी होगी। जीवनदायिनी कही जाने वाली नदियां न सिर्फ पशु, पक्षियों व इंसानों की प्यास बुझाती थीं, बल्कि खेतों में हरियाली लाकर अपनी उपस्थिति का अहसास भी कराती थीं। दूसरों को जीवन देने वाली जिले की प्रमुख नदियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। इन सबके बावजूद ये मुद्दा 17वीं लोकसभा के चुनावी एजेंडे से बाहर है। नदी जगह-जगह सूख चुकी है। कहीं-कहीं नदी का स्वरूप तो दिखता है, लेकिन वहां पानी न होकर कीचड़ और सिल्ट भरा हुआ है। यदा-कदा जहां थोड़ा बहुत पानी है भी तो वह सदाबहार जंगली घासों व जलकुंभी से ढका हुआ है। नदी में जमी सिल्ट ने काफी जमीनों को खाली छोड़ दिया और पास के खेतिहर लोगों ने इसे खेतों में मिला लिया। अगर यही हालात रहे तो इस नदी का वजूद भी खतरे में पड़ जाएगा। मनवर नदी में न तो पानी है और न ही ऐसा कोई दृश्य। कुछ जगह पर कीचड़ है। नदियों के किनारे खाली जमीन पर अब खेती की जा रही है। जीवनदायिनी कही जाने वाले ये नदी आज खुद ही बूंद-बूंद पानी को तरस रही हैं।

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प्रमुख नदियां व उनका महत्व

टेढ़ी नदी : यह नदी बहराइच के चित्तौरागढ़ झील से निकलकर टेढ़े मेढ़े आकार में प्रवाहित होने वाली टेढ़ी नदी बहराइच होते हुए गोंडा जिले में प्रवेश करती है। यह परगना गोंडा को ग्वारिच और महादेवा परगना से अलग करती हुए आगे चलकर महादेवा और डिकसिर परगनों की सीमा बनाती हुई नवाबगंज होती हुई अयोध्या से कुछ मील पहले घाघरा नदी में मिल जाती है। टेढ़ी नदी का पाट बड़ा ही घुमावदार है। इसी से इसका नाम टेढ़ी पड़ा।

सरयू नदी : यह नदी हिमालय पर्वत से निकल कर बहराइच में बहती हुई गोंडा जिले में प्रवेश करती है। पसका के पास घाघरा नदी में जाकर मिल जाती है। यहां संगम मेला भी लगता है। सरयू का धार्मिक महत्व जिले की समस्त नदियों में सबसे अधिक है।

घाघरा नदी : इस नदी का नामकरण विदेशियों ने किया है। यह कौड़ियाला, सरयू व चौका नदियों की संयुक्त जलधाराओं का नाम है। यह नदी ग्वारिच परगने के पश्चिम सीमांत से जिले में प्रवेश कर करीब 55 मील की दूरी तय करके अयोध्या के समीप लकड़मंडी नामक स्थान पर जिले से अलग हो जाती है। नदी का पाट बड़ा गहरा और विस्तृत बना रहा है। यह प्रतिवर्ष अपना स्थान बदलती रहती है। घाघरा में नौका परिवहन वर्षभर चलता है।

मनवर नदी : रुपईडीह ब्लॉक के ग्राम तिर्रेमनोरमा के एक पोखर मनवर नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। यहां से निकलकर ये नदी मनकापुर परगने के बीच से टिकरी जंगल को स्पर्श करती हुई बस्ती जिले में प्रवेश करती है। मनवर के उद्गम स्थल तिर्रे गांव के पोखरे में महर्षि उद्यालक का आश्रम था।

चमनई नदी : यह मनवर नदी की सहायक नदी है। यह सुभागपुर के पास से निकल कर मनकापुर और महादेवा परगने को अलग करती हुई टिकरी जंगल की पश्चिमी दक्षिणी सीमा को स्पर्श करती हुई बस्ती गोंडा की सीमा पर मनवर में मिल जाती है। इसका नामकरण च्यवन मुनि के नाम पर माना जाता है। च्यवन मुनि का आश्रम सुभागपुर में था। यहां अब भी प्रतिवर्ष मेला लगता है।

बिसुही नदी : कुआनों के दक्षिण बिसुही नाम की छोटी नदी है। यह बहराइच के इकौना परगने से निकलकर परगना गोंडा की पश्चिमी सीमा पर प्रवेश करती है। जनपद में 70 मील की यात्रा पूरी करके यह कुआनों नदी में मिल जाती है।

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पब्लिक बोल

वरिष्ठ नागरिक राम प्रताप वर्मा का कहना है मनवर नदी में पहले खूब पानी रहता था। यहां लोग सुबह स्नान भी करते थे, लेकिन अब यहां अब नदी का नाम ही बचा है। अधिवक्ता रोहित तिवारी का कहना है कि मनवर नदी का वजूद लौटाने के लिए सभी को प्रयास करना चाहिए। श्रमदान के लिए भी लोग आगे आएं। समाजसेवी प्रदीप शुक्ल ने नदी बचाओ अभियान में सभी को शामिल होने का आह्वान किया है। युवा टोनू शुक्ल का कहना है कि हमने नदी में पानी कभी नहीं देखा, नदियां जीवनदायिनी कही जाती हैं।

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मनवर व टेढ़ी नदी को मनरेगा के तहत पुनर्जीवित करने के लिए चयनित किया गया है। पहले चरण में नदियों के किनारे तालाबों को संवारा जा रहा है। इस वित्तीय वर्ष में नदी की सिल्ट सफाई कराई जाएगी। इसके लिए कार्यवाही चल रही है।

-हरिश्चंद्र राम प्रजापति, उपायुक्त श्रम एवं रोजगार गोंडा

Posted By: Jagran

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