गोंडा : कैसरगंज लोकसभा क्षेत्र का अधिकांश भाग भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा पथ क्षेत्र में पड़ता है। यहां पौराणिक व ऐतिहासिक स्थल बहुतायत हैं। इसी क्षेत्र के पसका में भगवान विष्णु सतयुग में दैत्य हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह के रूप में अवतरित हुए थे। इसके चलते इसे सूकरखेत के नाम से जाना जाता है। यहीं पर आदि काल से पवित्र सरयू व घाघरा नदियों का संगम तट है। इसके चलते यहां कल्पवास करने की परंपरा है। यहां लगने वाले संगम मेले में लाखों लोग स्नान करते हैं। उमरी बेगमगंज में आदि शक्ति मां वाराही का मंदिर व तरबगंज के जमथा में ऋषि यमदग्नि का आश्रम है। अमर काव्य रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास की परसपुर के राजापुर में जन्मस्थली है तो सूकरखेत के त्रिमुहानी घाट के समीप इनके गुरु नरहरि दास जी की तपोभूमि है। तमाम पौराणिक मान्यताओं के बावजूद नेताओं की बेरुखी से यह स्थल बदहाल हैं। यहां तक कि दोनों नदियों के मिलन कराने वाली धारा बांध के दायरे में आ गई। इसके चलते संगम की सार्थकता समाप्त हो गई लेकिन, नेतागण खामोश रहे। इसी मुद्दे पर नंदौर गांव में दैनिक जागरण ने चौपाल का आयोजन किया। एक रिपोर्ट..।

नंदौर गांव के निवासी व समाजसेवी रजनीश प्रताप सिंह ने कहा कि पौराणिक स्थल पसका जहां भगवान वराह के अवतार स्थल होने के साथ ही सरयू घाघरा दो नदियों के संगम होने का भी गौरव मिला है लेकिन, चरसड़ी बांध निर्माण के वक्त घाघरा से निकल कर सरयू में मिलने वाली धारा बांध की चपेट में आ गई और संगम समाप्त हो गया। धारा पर साइफन बनाकर उसके गौरवशाली अतीत को लौटाया जाए। राघवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि स्नान घाट से कुछ दूर शवों के अंतिम संस्कार के लिए शवदाह घर बना होने के बावजूद स्नानघाट पर ही शव जलाए जाने से नदी तट पर गंदगी की भरमार व अवशेष पड़े होने से लोगों को स्नान करने में परेशानी होती है। यहां यदि कुछ समय के लिए पुलिस की ड्यूटी लग जाए तो शवों के जलाने पर रोक लग जाए। सुरेश सिंह बोले कि पौराणिक भगवान वराह मंदिर हमारे आस्था का प्रतीक है। नरहरि आश्रम गोस्वामी तुलसीदास की गुरुभूमि व सरयू घाघरा संगम तट त्रिमुहानी घाट साक्षात देव स्थल है, इसलिए पसका को पर्यटन स्थल बनाया जाए। कवि जयदीप सिंह सरस ने कहा कि घर-घर में पढ़े जाने वाले रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास की जन्मभूमि राजापुर को विकसित कर विश्व मानचित्र पर लाया जाए। प्रधान बाबादीन ने कहा कि प्रयागराज के बाद पसका सूकरखेत ही ऐसा स्थल है जहां कल्पवास करने की परंपरा आदि काल से चली आ रही है। सैकड़ों संत महात्मा व श्रद्धालु जिस संगम तट पर फूस की झोपड़ी डालकर माह भर कल्पवास करते हैं वहां संगम ही खत्म हो गया है। इसलिए साइफन बनाकर दोनों नदियों का संगम बरकरार रखा जाए। बड़कऊ सिंह बोले कि संगम तट पर नदी पक्का घाट छोड़कर दूर चली गई है, इसलिए घाट से मिट्टी हटाकर नदी को स्नान घाट तक लाया जाए। अंकित मिश्र ने कहा कि पौराणिक स्थलों का विकास करके यहां सभी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। अजय प्रताप सिंह ने कहा कि सूकर खेत में लगने वाला संगम मेला को राष्ट्रीय मेला का दर्जा दिया जाए। यहां धर्मशाला आदि का निर्माण हो ताकि चौरासी कोसी परिक्रमार्थियों सहित अन्य श्रद्धालुओं को परेशानी न हो। इसी तरह चंद्रभान सिंह, धनलाल, देवनाथ सिंह, बसंतलाल, बजरंग सिंह, विजय प्रताप सिंह, उदयराज सिंह, देशराज सिंह, तहसीलदार, देवीदीन , प्रदीप, शशांक, सुधीर, रोहित, सर्वादीन, फतेहबहादुर सिंह, रामकुमार अखिलेश, पप्पू व अशोक सिंह ने पौराणिक स्थलों के विकास पर अपनी आवाज बुलंद की।

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चौपाल की खास बातें

----चौरासी कोसी परिक्रमा पथ का हो चौड़ीकरण।

-परिक्रमा पथ के निकट पड़ने वाले धार्मिक स्थलों का हो विकास।

-प्रमुख स्थलों को विकसित कर उन्हें धार्मिक पर्यटन स्थल घोषित किया जाए।

-सरयू व घाघरा नदी के संगम के वजूद को लौटाने के लिए साइफन बनाया जाए।

Posted By: Jagran

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