'दैनिक जागरण' द्वारा किसानों की मगई नदी से बर्बाद हुई खेती के विषय पर चलाये जा रहे अभियान को अब पंख लग गया है। किसान भी आगे बढ़कर इसको अपना अभियान बनाकर अगुवाई करने लगे हैं। इस क्रम में जहां गुरुवार को किसानों ने तहसीलदार को पत्रक दिया वहीं शुक्रवार से गांव-गांव में क्रमिक धरना शुरू हो गया। प्रकृति व प्रशासन की मार के बाद अब बीमा कंपनियों द्वारा भी धोखा दिए जाने से किसान आहत हैं। उनके सामने करो या मरो की स्थित है। उनकी एक फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है और अब दूसरी फसल के भी कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में किसानों ने अपने अधिकार के लिए कमर कसना शुरू कर दिया है। 'दैनिक जागरण' के समाचारीय अभियान से उन्हें संजीवनी मिली है और वह मुखर होकर सामने आने लगे हैं। शुक्रवार से कई गांवों में क्रमिक धरना भी शुरू हो गया।

जासं, लौवाडीह (गाजीपुर) : करइल के किसानों के साथ प्रशासन तो अन्याय कर ही रहा है, अब बीमा कंपनियां भी किसानों का हक लूटने में लगे हुई हैं। बीमा कंपनी वाले राजस्व विभाग की मिलीभगत से फसल की 50 फीसद से भी कम नुकसान की रिपोर्ट तैयार कर रही हैं, जबकि अधिकांश किसानों के घर अन्न का एक दाना भी नहीं जा पाया है। पूरा प्रीमियम लेने के बाद भी बीमा कंपनियों का यह हाल है। इससे किसान दोहरी मार झेलने को विवश हैं।

प्रति वर्ष करोड़ों रुपये की धनराशि किसानों द्वारा प्रीमियम के रूप में दी जाती है, जिससे बीमा कंपनियों को काफी लाभ होता है लेकिन जब प्राकृतिक आपदा आती है तो उस समय बीमा कंपनियां सहायता राशि न देने के लिए तमाम उपाय लगाना शुरू कर देती हैं। अपनी जेब भरने के लिए प्रशासनिक अधिकारी भी इन्हीं का साथ देते हैं और क्षति काफी कम आंकी जाती है। इसमें केवल बीमा कंपनी ही नहीं, बड़े अधिकारी भी सम्मलित हैं। गंगा के प्रकोप के बाद मंगई नदी ने भी तबाही मचानी शुरू कर दी। इस तबाही से रघुवरगंज, लौवाडीह, परसा, राजापुर, करीमुद्दीनपुर, मुर्तजीपुर, खेमपुर, सिलाइच, रेड़मार, पारो व जोगामुसाहिब, देवरिया, सरदरपुर, सियाड़ी, गोंड़उर, महेंद, मसौनी, लठ्ठूडीह व सोनवानी सहित कई गांव की 60 से 80 प्रतिशत फसल नष्ट हो गयी है। लेकिन बीमा कंपनी वाले प्रशासनिक अधिकारियों से मिलकर अधिकांश गांव का नुकसान 50 प्रतिशत या उससे कम दिखाए हैं। जब तक 50 प्रतिशत से अधिक नुकसान नहीं दिखाया जाएगा किसानों को कोई भी मदद नहीं मिल पाएगी। इसके लिए न तो सर्वे किया गया और न ही निरीक्षण। बीमा कंपनी का कोई भी पदाधिकारी किसी भी गांव में सर्वे करने नहीं गया। ज्ञात हो कि बीमा क्षतिपूर्ति का सर्वे करने के लिए लेखपाल बीमा कंपनी और कृषि विभाग का एक सदस्य होता है जिसका अध्यक्ष लेखपाल होता है। बीमा कंपनियां इन पर कम नुकसान दिखाने के लिए दबाव बनाती हैं जब दबाव से बात नहीं बनती तो लेनदेन शुरू हो जाता है। कुछ जगह आंकलन तो सही किया गया लेकिन अधिकांश जगह नुकसान कम ही दिखाया गया है।

------------ 2016 में धोखा खा चुके हैं किसान

: यही स्थिति 2016 में हुई थी। गंगा के बाढ़ ने पूरे क्षेत्र को बर्बाद कर दिया था। बीमा के रूप में तत्काल सहायता के रूप में बीमा राशि के रूप में 25 प्रतिशत की एक किस्त आयी लेकिन अन्य किस्तों का इंतजार आज भी किसान कर रहे हैं। सियाड़ी के कुछ किसान हाईकोर्ट गए जहां से किसानों को बीमा राशि देने के लिए डीएम को निर्देश दिया गया लेकिन आज तक वह राशि नहीं मिली। उस राशि का क्या हुआ यह जांच का विषय है। लौवाडीह किसानों ने बताया कि पूर्व जिला कृषि अधिकारी अशोक प्रजापति किसानों के लिए प्रयास करते थे लेकिन उनके जाने के बाद स्थिति निराशाजनक है। किसानों के लिए कोई प्रयास नहीं किया जाता है।

लौवाडीह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सरकार द्वारा किसानों के हित के लिए लायी गयी सबसे महत्वपूर्ण योजना है। इस सरकार के आने के बाद लगा कि और अधिक पारदर्शी होगी लेकिन इस समय किसानों का हक और भी अधिक छीन जा रहा है। लौवाडीह खरीफ की फसल नष्ट हो गयी है रबी की फसल की भी बोआई संभव नहीं है।

Posted By: Jagran

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