गाजीपुर मेडिकल कॉलेज की लैब में किडनी को बताया फेल, प्राइवेट जांच में रिपोर्ट आई नॉर्मल
गाजीपुर मेडिकल कॉलेज की पैथोलॉजी लैब में एक युवती की किडनी फंक्शन टेस्ट रिपोर्ट में गंभीर गड़बड़ी पाई गई, जहां ...और पढ़ें
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किडनी रिपोर्टों में भारी अंतर से जांच प्रक्रिया पर सवाल।
HighLights
मेडिकल कॉलेज लैब रिपोर्ट में किडनी फेल दर्शाई गई।
निजी लैब जांच में युवती के सभी पैरामीटर सामान्य मिले।
प्राचार्य ने सैंपल लेबलिंग में मानवीय भूल की आशंका जताई।
जागरण संवाददाता, गाजीपुर। महर्षि विश्वामित्र स्वशासी राजकीय मेडिकल कॉलेज की पैथोलॉजी लैब की जांच रिपोर्ट में गंभीर गड़बड़ी आई है। यहां भर्ती 26 वर्षीय युवती की जांच में यूरिया और क्रिएटिनिन का स्तर सामान्य से कई गुना अधिक दर्शाया गया जिससे किडनी की गंभीर बीमारी की आशंका पैदा हो गई।
निजी लैब में जांच कराई तो तीनों प्रमुख पैरामीटर सामान्य मिले। दोनों रिपोर्टों में अंतर सामने आने के बाद सरकारी लैब की जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं।
हुसेनपुर (बारहबंगला) निवासी ओमप्रकाश ने आठ अक्टूबर की शाम तबीयत खराब होने पर अपनी पुत्री वर्षा (26) को मेडिकल कालेज की इमरजेंसी में भर्ती कराया। चिकित्सक ने डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड और किडनी फंक्शन टेस्ट (केएफटी) कराने को कहा। रक्त का नमूना मेडिकल कालेज की लैब में भेजा गया।
नौ अक्टूबर को जारी रिपोर्ट में सीरम यूरिया 224 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर दर्ज किया गया, जबकि इसकी सामान्य सीमा 15 से 45 है। इसी तरह सीरम क्रिएटिनिन 3.68 मिला, जबकि सामान्य सीमा 0.50 से 1.50 है। ब्लड यूरिया नाइट्रोजन (बीयूएन) भी 104.5 दर्ज किया गया, जबकि सामान्य सीमा 7 से 18.7 है।
सरकारी रिपोर्ट में इन मानकों का स्तर काफी अधिक देखकर परिजन परेशान हो गए। ओमप्रकाश ने शहर के आरपी डायग्नोस्टिक सेंटर में निजी जांच कराई। वहां सीरम यूरिया 26.30, क्रिएटिनिन 0.83 और बीयूएन 12.1 मिला। तीनों परिणाम सामान्य सीमा में थे। एक ही मरीज की दोनों जांच रिपोर्टों में इतना बड़ा अंतर मिलने से सरकारी लैब की रिपोर्ट पर सवाल उठाए।
ओमप्रकाश का कहना है कि यदि सरकारी रिपोर्ट के आधार पर किडनी की गंभीर बीमारी मानकर इलाज शुरू कर दिया जाता तो युवती को अनावश्यक दवाएं दी जा सकती थीं और उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता था। ओमप्रकाश ने दोनों जांच रिपोर्टों के साथ मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को लिखित शिकायत दी है।
लैब में जो ब्लड सैंपल भेजा गया था उसकी जांच दो से तीन बार की गई और मशीन के अनुसार रिपोर्ट वही आ रही थी। जब यह स्पष्ट हुआ कि रिपोर्ट बच्ची के शारीरिक लक्षणों से मेल नहीं खा रही है तब दोबारा नया सैंपल लेकर जांच कराई गई जो बाहर की रिपोर्ट से मेल खा गई।
यह सैंपल की लेबलिंग में हुई मानवीय भूल का मामला लगता है जिसमें रक्त किसी अन्य मरीज का था और उस पर लेबल इस बच्ची के नाम का लग गया। शिकायत की जांच कराई जा रही है। जिस भी कर्मचारी की लापरवाही पाई जाएगी उसके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी। -डॉ. आनंद मिश्रा प्रिंसिपल राजकीय मेडिकल कॉलेज।
